Popular Posts

Friday, December 26, 2014

क्यों दिल का रोग लगाया हमने


अजब इस दिल की मुश्किल है
जिसको चाहा वही दिल से दूर है।
हमसफ़र के होते हुए भी ज़िन्दगी
की राहों में आज भी सिर्फ तन्हाई है।
तन्हाई की आदत यूं तो थी पहले भी
पर न जाने क्यों आज इस तन्हाई
ने दिल में कैसी पीर उठाई है।
शिकवा नहीं हमें किसी से भी
फिर भी अपने आप से गिला है
क्यों दिल को रोग लगाया हमने
जिसका हमें मिला ऐसा सिला है।
दोष न इसमें उनका न हमारा है
क्योंकि हमें यह हाल भी गवारा है।
दूर ही सही पर दिल को तसल्ली है
कि आखिर वो प्यारा प्यार हमारा है।

Thursday, December 4, 2014

याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना

याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना
वो तुम्हें देखकर मेरा खुद से ही नज़रें चुराना
महफ़िल के बीच छुपकर तुमसे नज़रें मिलाना

याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना।

याद है मुझे आज भी वहां मेरा वो देर से आना
बातें करते-करते तुम्हारी बातों में खो जाना।
तुमसे और बात करने के लिए मेरा ढूंढ़ना बहाना
याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना।
याद है मुझे अब भी तुम्हारा मेरा दिल धड़काना
याद है अब भी मुझे वो मेरा शर्म से नज़रें झुकाना।
याद है मुझे अब भी तुमसे हाल-ए-दिल छिपाना। याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना। 

Sunday, September 14, 2014

अंधेरे रास्तों पर

जीवन में क्यों कोई राह नजर नहीं आती है ?
हर राह पर क्यों नई परेशानी चली आती है ?
जब जब चाहा भूल जाऊं अपनी उलझनों को 
तब तब एक और नई उलझन मिल जाती है। 
खुलकर जीना और हंसना मैं भी चाहती हूं 
पर ज़िन्दगी हर बार ही बेवजह रुला जाती है। 
पूछना चाहती हूं ज़िन्दगी से खता क्या है मेरी 
क्यों जीवन की राहें मेरी हो गयी हैं अंधेरी। 
अंधेरी राहों पर आखिर कब तक ऐसे चलूंगी 
एक दिन ढलती शाम के साथ मैं भी ढलूंगी। 
अंधेरे इन रास्तों पर न मंज़िल का ठिकाना है 
और न इस डगर पर जीने का कोई बहाना है। 
कैसे जिऊं मैं इन कठिन रास्तों पर चलकर
क्यों खुशियां नहीं आती अपना रास्ता बदलकर। 
ऐसा नहीं कि मैंने कोशिश नहीं की इन्हे बुलाने की 
पर जैसे खुशियां कसम खा चुकी हैं मुझे भुलाने की। 
जब जब चाहा जी लूं ज़िन्दगी मैं भी खुलकर। 
ज़िन्दगी ने दी गम की सौगात दोबारा हंसकर।

Saturday, September 6, 2014

मैं 'लड़की' हूं

जकड़ी हूं बंधन में 
सदियों से 
अब मुझे मुक्ति चाहिए। 
बंधन खोल सके जो 
आज़ादी दे मुझे 
वो शक्ति अब चाहिए। 
उड़ना चाहती हूं 
स्वच्छंद गगन में 
'पर' मुझे मेरे चाहिए। 
मैं लड़की हूं 
हां मैं लड़की हूं 
तो क्या हुआ 
जीना का हक़ मुझे भी चाहिए। 
अब न सहूंगी बंधन 
अब न उठाऊंगी रिवाजों की 
बेड़ियों का भार 
हां मुझे भी अब 
जीवन में बहार चाहिए। 
 

Saturday, August 30, 2014

खूबसूरत हो तुम

खूबसूरती एक मुस्कराहट है 
और इस मुस्कराहट में 
अपनी हंसी से 
चांदनी बिखेरती हो तुम। 

खूबसूरती एक सपना है 
और उन सपनों में 
अपनी उम्मीदों के 
रंग भर जाती हो तुम। 

खूबसूरती एक जगमगाहट है
और उस जगमगाहट में 
अपनी बातों से 
रोशनी भर जाती हो तुम। 

खूबसूरती एक प्यारी अदा है 
और उस अदा को 
अपने प्यार के 
एहसास से भर जाती हो तुम। 

खूबसूरती का नाम मां है 
और उस मां को 
अपनी ममता से 
और प्यारी बना जाती हो तुम। 
 
खूबसूरती के सभी नामों 
को और खूबसूरत बनाती हो तुम 
इसीलिए कहती हूं 
मेरी नज़रों में 
खूबसूरत हो तुम। 

Saturday, June 21, 2014

तितली सी चंचलता

तितली सा चंचल बन मन मेरा 
उड़ना चाहता है। 
नन्हीं सी तितली रानी देख तुम्हें 
मन मेरा हर्षाता है। 
उड़कर तेरी तरह मन मेरा फूलों पर 
मंडराना चाहता है। 
डाल-डाल पर बैठकर यौवन मेरा
इठलाना चाहता है। 
रंग-बिरंगे पंख हों मेरे दिल यही 
मांगना चाहता है। 
कोमल सी काया चंचल नैन मन 
मेरा पाना चाहता है। 
तितली आज मन मेरा तुझ जैसा 
इतराना चाहता है। 
बच्चों के साथ मन मेरा अठखेलियां 
करना चाहता है।    
सबके साथ घुल-मिल कर मन आज 
खेलना चाहता है। 
उडूं आज स्वच्छंद, मन मेरा बन्धन 
तोड़ना चाहता है। 
चंचल मन मेरा आज हर भेदभाव 
भूलना चाहता है। 
तितली सी चंचलता मैं मन मेरा 
खो जाना चाहता है।    

वे सुहाने दिन

याद  बहुत आते हैं 
बचपन के वो दिन 
 
वो अनमोल प्यारे 
न भूलने वाले पल 
 
कभी शरारत में तो 
कभी अल्हड़पन में 
 
तो कभी किसी की 
मुस्कराहट वापस 
 
लाने के लिए खेले थे 
हम सबने जो खेल 
 
वो मीठी मीठी बातें 
वो दिल को छू जाने 
 
वाले प्यारे से बोल 
बचपन के उस प्यारे 
 
एहसास से भीग रहा 
है मेरा नादां मन 
 
दिल कर रहा है आज 
तोड़कर सारे बंधन 
 
जी लूं दोबारा अपने 
बचपन के सुनहरे पल 
 
वो मस्ती वो भोलापन 
कहलाता था जो बचपन 
 
जीवन के इस सुहाने दौर 
से गुजरे हैं हम सभी 
 
और याद भी आता है 
हम सबको अपना 
 
वो नन्हा सा बचपन 
वो तितलियों के पीछे 
 
भागना, वो चलते रिक्शॉ 
पर लटक जाना 
 
कागज की नाव और 
छोटी चीजों से खुश 
 
हो जाना, उड़ते जहाज 
को देख खुश होना, 
 
नए खिलौने देखकर 
मचल जाना और फिर 
 
नयी शरारतों से सबको 
हंसाना, गुदगुदाना 
 
वो परियों की कहानी 
सुनकर खुश हो जाना 
 
न बड़ी चाहतें न अरमान 
बस लोरी और माँ की 
 
दुलार ही थी दुनिया 
ऐसा ही तो था शायद 
 
हम सबका बचपन या 
उम्र का दौर सुहाना  
 
जाने क्यों बीत गए 
वो पल इतनी जल्दी 
 
क्यों खो गयी हमारी 
वो नन्ही दुनिया 
 
जब हमारा बचपन था 
हर गम से बेगाना।

Thursday, June 19, 2014

आखिर मिला क्या ?

आज के बदलते आधुनिक समय में हम सभी इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमारे पास हमारे मित्रों तथा संबंधियों के लिए तो दूर अपने बच्चों तक के लिए पर्याप्त समय नहीं है, जिसका परिणाम है हमारी आज की आक्रोशित युवा पीढ़ी। आज के युवा में सहनशक्ति व धैर्य जैसे गुण तो लेश मात्र भी नहीं बचे। बात-बात पर वे मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी ही एक घटना सामने आई है देश की राजधानी दिल्ली के बाहरी इलाके बख्तावरपुर गढ़ी गांव से, जहां एक युवा ने अपने लालच के चलते पहले अपनी पत्नी, साले और ससुर की हत्या की और फिर खुद को ही गोली मारकर अपनी जान ले ली। यह सब उसने सिर्फ इसलिए किया क्योंकि उसे ससुराल वालों से कार नहीं मिली थी। उन लोगों ने कुछ समय बाद कार देने की बात कही थी लेकिन वो युवा सब्र न कर सका और उसने इस आपराधिक घटना को अन्जाम दे दिया। लेकिन इतना सब करने के बाद उस युवा को क्या मिला? उसने तो स्वयं अपना जीवन तक गंवा दिया फिर इस अधैर्य और गुस्से का क्या मतलब?  
इस घटना के बाद एक बार फिर इस बात पर ध्यान देने की जरूरत महसूस की जा रही है कि क्यों आजकल युवा इतने अधीर होते जा रहे हैं? आखिर क्यों वे बात-बात पर अपना आपा खो रहे हैं? इस घटना के लिए जितनी दोषी हमारे समाज में व्याप्त दहेज़ जैसी कुप्रथा है उतना ही दोष बदलता सामाजिक परिवेश और कुंठित होती मानसिक स्थिति का भी है। आज हमारे समाज का माहौल पूरी तरह बदलता जा रहा है और इसका सबसे ज्यादा असर नयी पीढ़ी पर पड़ रहा है। यह गुस्सा कोई एक दिन की उपज नहीं होता,ये धीरे-धीरे युवाओं के दिलो-दिमाग में प्रवेश करता है और फिर एक दिन अचानक उनका पूरा जीवन बदल देता है। आक्रोश में आकर किसी अपराध को अन्जाम देने वाले अधिकतर युवा शुरुआत में गुस्सैल तथा चिड़चिड़े हो जाते हैं लेकिन परिवार वाले अक्सर इन बातों की अनदेखी कर इन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं देते। शुरुआत में देखा जाए तो यह सब मामूली ही लगता है। कभी परीक्षा में वांछित परिणाम नहीं आए, तो कभी प्रेम में असफलता, तो कभी दांपत्य जीवन के बीच बढ़ रही कड़वाहट तो कभी कॅरियर में मिली असफलता व्यक्ति के आक्रोश को इस हद तक बढ़ा देते हैं कि वह खुद ही अपनी जान ले लेता है। 
 युवाओं को इस मानसिक कुंठा से दूर रखने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि शुरू से ही उनकी परवरिश पर पूरा ध्यान दिया जाए। उनकी गतिविधियों का मूल्यांकन किया जाए तथा बचपन से ही उनमें किसी भी प्रकार की परिस्थिति से लड़ने का जज़्बा पैदा किया जाए। अगर अब भी युवाओं के भटकाव को सही दिशा नहीं मिली तो जल्द ही पूरा समाज दिशाहीन हो जाएगा जिसकी ख्वाहिश शायद हममें से किसी ने नहीं की होगी।  

Monday, June 9, 2014

बचपन की कैद

नन्हें नन्हें कांधों पर वजन उठाये 
कौन सी जंग लड़ रहे हैं ये  
ज़िन्दगी के मासूम सिपाही। 
क्या यही है इनके लिये 
ज़िन्दगी की अनमोल सौगात?
कब तक यूँ ही बोझा ढोयेंगे 
ये नन्हें-नन्हें कोमल हाथ?
क्या यही है इनके लिये 
ज़िन्दगी के असली मायने?
या देख पाएंगे ये भी कभी 
बचपन के सपने सुहाने?
गुड्डे-गुड़ियों का घर सजाने 
की नन्हीं सी उम्र में ये 
आशियाना किसी और का 
सजाते हैं। 
बस्ते का बोझ उठाने वाले हाथ 
ईंट-पत्थरों के बोझ के नीचे 
दबते जाते हैं। 
मासूम सी उम्र मे जाने कैसे 
गंभीर सितम भी हंसकर 
सह जाते हैं। 
खुद स्कूल जाने की उम्र में 
किसी और के बच्चों को स्कूल 
छोड़कर आते हैं। 
खिलौनों से खेलने के दौर 
 
में 
खुद किसी और के हाथ का 
खिलौना बन जाते हैं। 
सुहाने बचपन के सपने तो 
इनके लिए बेगाने हैं। 
सुख के दिन तो इनके लिये 
जैसे अनजाने हैं। 
छोटी सी उम्मीद पाली है मैने मन में 
कभी तो बहार आये इनके भी जीवन में 
खुशियों का आसमां न सही 
मुट्ठी भर जमीन ही मिल जाये 
इनको अपनी दुनिया सजाने को। 
बचपन के वो नटखट पल 
वो शरारतों भरी हलचल 
इन बाल मजदूरों को भी 
कभी अपना बना जाएं। 
आखिर कभी बचपन की खुशियां 
इनके हिस्से भी आएं।  
बचपन की गिरफ्त से आज़ाद ये पंछी 
फिर से बचपन की कैद में आ जाएं। 

Saturday, June 7, 2014

मंज़िल अभी दूर है...

हमारा देश लगातार आधुनिक हो रहा है और तकनीक विकास में भी हम किसी से पीछे नहीं हैं, इसी बात की पुष्टि करती है देश की राजधानी दिल्ली में शुरू हुई नई सुविधा। इसके तहत अब दिल्ली के 24 सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में ऑनलाइन पंजीकरण सेवा का लाभ लिया जा सकता है। इस सुविधा के तहत कोई भी व्यक्ति अपने घर से ही अगले 15 दिनों तक इलाज के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकता है और इसके बाद मरीज संबंधित अस्पताल के उस विभाग में सीधे जा सकता है जहां उसे इलाज कराना है।
इस सुविधा के तहत अब आपको ओपीडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए लम्बी कतारों में लगने जरूरत नहीं पड़ेगी और आप अपना काफी समय भी बचा पाएंगे। निश्चित रूप से यह सुविधा हमारे तकनीक के क्षेत्र में विकासशील होने का प्रमाण देती है और इससे कुछ लोगों को लाभ भी होगा। लेकिन इस सुविधा की मंज़िल अभी भी काफी लोगों से बहुत दूर है। इसका सबसे प्रमुख कारण इस सुविधा के प्रति जागरूकता का अभाव है और जागरूकता की ये कमी सिर्फ मरीजों में ही नहीं बल्कि अस्पताल प्रशासन में भी देखी जा सकती है।  मरीज अभी भी इस सुविधा का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। 
इस सुविधा का अगर दूसरा पहलू देखें तो हम पाएंगे कि ये सुविधा सिर्फ विशेष तबके को ही लाभ पहुंचा सकती है। क्योंकि भले ही हम कितने ही उन्नतशील हो गए हों लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में जाने वाले गरीब तबके के लिए अभी भी ऑनलाइन पंजीकरण की बात टेढ़ी खीर ही है। वे अभी इतने आधुनिक नहीं हुए हैं कि इस तरह की सुविधा से रुबरु हो सकें। सरकारी अस्पताल में आने वाले गरीब मरीजों को इससे कोई लाभ नहीं होने वाला। लगता है ये सुविधा मध्यम वर्ग उसमें भी खासकर उच्च मध्यम वर्ग को ध्यान में रखकर प्रदान  की गयी है। सरकार की यह सकारात्मक पहल एक तरह से कहीं न कहीं सब तरफ से दबाये जा रहे गरीबों के साथ नाइंसाफी  ही है। पहले ही उन्हें सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए काफी जद्दोजेहद करनी पड़ती थी अब ये समस्या और बढ़ जाएगी। गरीब मरीजों के साथ सरकारी अस्पतालों में हो रहे पक्षपात व दुर्व्यवहार के किस्से तो हम सभी सुनते-पढ़ते ही रहते हैं।  इस सुविधा के बाद ऑनलाइन पंजीकरण कराने वाले रोगी डॉक्टर को दिखाने की पंक्ति में पहले पहुंच जाएंगे और बेचारे कतारों में लगकर पंजीकरण कराने वाले गरीब रोगी घंटों इंतजार करने के बाद ही डॉक्टर को दिखा पाएंगे। ऐसे में तो साफ दिखता है कि इस सुविधा से निचले तबके को लाभ होने की बजाय नुकसान ही होगा। 
सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मिली ये सुविधा कुछ हद तक तारीफ के काबिल है  पर सभी पक्षों से इसका मूल्यांकन किया जाये तो ये सुविधा  गरीबों के साथ अन्याय है। इससे बेहतर तो अस्पतालों में डॉक्टर की संख्या, जांच उपकरणों के सही रख-रखाव और उनकी संख्या में वृद्धि, दवाइयों का प्रबंध तथा  अन्य मूलभूत व आवश्यक सुविधाओं में बढ़ोतरी करके सरकार गरीबों को ज्यादा लाभ पहुंचा सकती थी। माना तकनीकी के इस युग में तकनीकी की भाषा समझना जरूरी है लेकिन ये हमारी प्राथमिकता नहीं है। हमारी प्राथमिकता समय पर उचित इलाज व दवाइयों का मिलना है। अगर मरीजों की ये आवश्यकता ही पूरी नहीं हो सकती तो तकनीकी के विकास के बातें करना व्यर्थ है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बाकी सारी बातें धरी की धरी रह जाती हैं। इसलिए मैं तो यही कहना चाहूंगी कि सरकार ने शायद 'इंडिया' में रहने वाले कुछ लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर ये सुविधा दी है, इस सुविधा के मद्देनजर शायद 'भारत' में रहने वाली एक बहुत बड़ी आबादी को उपेक्षित कर दिया गया है। इसलिए मेरे अनुसार सुविधाओं की राह से मंज़िल अभी बहुत दूर है।    

Friday, June 6, 2014

अभी भी वक़्त है संभलने का

आजकल बेमौसम बरसात, अचानक आये आंधी-तूफान या भूकम्प से हम सभी आतंकित हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण हम सबका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। कब कौन सी प्राकृतिक आपदा हमारा सब कुछ तबाह करके चली जाएगी, हमें इसका अंदाजा तक नहीं है। हम सभी एक डर के साये में जीने को मजबूर हैं। इस डर के माहौल में हम प्रकृति को कोस रहे हैं, जो लगातार हमसे हमारे अपनों को छीन रही है लेकिन इन सबके बीच हम सबसे जरूरी बात भूल रहे हैं वो यह कि इसके जिम्मेदार भी हम खुद ही हैं। ये हमारा स्वार्थ ही था जिसके चलते हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया और आज प्रकृति हमारे साथ खिलवाड़ कर रही है। 
आज बेमौसम बरसात हो रही है और बारिश के दिनों में हमें बारिश के लिए तरसना पड़ता है। आज भी जब मैं कुछ साल पहले के अपने बचपन के दिन याद करती हूं तो मुझे याद आता है कि किस तरह हमारे स्कूल जाते-जाते ही झमाझम बारिश हो जाती थी और उस बारिश में भीगकर हम बहुत खुश होते थे। लेकिन अब बारिश के मौसम में हमें बारिश के लिए तरसना पड़ता है। आज हम प्रार्थना करते हैं कि यदि इंद्र देव की मेहरबानी हो तो हमें सूर्य देव के तीखे तेवरों और उनकी चढ़ती रश्मियों से थोड़ी देर राहत मिले। आज के हालत देखकर सोचती हूं कि कैसे कुछ ही समय में परिस्तिथियों में इतना फर्क आ गया ? पहले लोग अच्छे स्वास्थ्य के लिए सूर्य स्नान या सूर्य नमस्कार जैसी चीजों को महत्त्व देते थे लेकिन आज तो हमने सूर्य को भी इतना प्रदूषित कर दिया हैं कि अब उससे हमें फायदे की जगह नुकसान होने लगे हैं। 
ये सब परिणाम है हमारी स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं का, जिनकी पूर्ति के लिए हमने अंधाधुंध प्रकृति का शोषण किया। विकास के नाम पर लगातार नदियों, जंगलों, पहाड़ों और उद्यानों को नष्ट किया। इसके पीछे हमारे समाज के प्रबुद्ध वर्ग तर्क देते रहे कि विकास अपनी कीमत मांगता है लेकिन यह कैसा विकास है जो मानव के सर्वनाश का कारण बन रहा है। आज चारों ओर पृथ्वी पर ही रहे विनाश की चर्चा हो रही है। कहीं जंगलों में आग लग रही है तो कहीं भूकम्प ने मनुष्य जीवन को हिलाकर रख दिया है तो कहीं मनुष्य बाढ़ से ट्रस्ट है। इन हालातों को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यदि मनुष्य ऐसे ही निरंतर प्रकृति का दोहन करता रहा तो आने वाले समय में पूरी धरती नष्ट हो जाएगी। 
प्रकृति की इस दुर्दशा को देखते हुए इसके संरक्षण के लिए हमारे देश के कुछ लोगों ने वर्ष में एक बार पर्यावरण दिवस मनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का दायित्व उठाया है और यहां भी हालात बिलकुल ऐसे ही हैं जैसे हिंदी दिवस मनाने के हैं। साल में बस एक बार इनको बचाने का झुनझुना बजाकर हम खुद को सांत्वना दे रहे हैं। हम सिर्फ कुछ कार्यशालाओं और कार्यक्रमों का आयोजन कर अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि ये सिर्फ एक दिन की बात नहीं प्रकृति और उससे जुड़े मानव के सदा के संरक्षण का मसला है। ये प्रश्न है तो हमारे जलवायु और वायुमंडल में हो रहे परिवर्तनों का, जिसके लिए हम सभी दोषी हैं। सिर्फ एक दिन पर्यावरण दिवस मनाने से यह समस्या हल नहीं होने वाली, इसके लिए हम सभी के समग्र प्रयासों की आवश्यकता है। आवश्यकता है इस बात की कि हम सभी अपने-अपने स्तर पर इस प्रयास में अपनी भागीदारी निभाएं। अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है, यदि हम सभी सही मायनों में सफल प्रयास करना चाहें तो हम अब भी अपने विनाश को रोक सकते हैं।         

Tuesday, June 3, 2014

इससे तो हम पिछड़े ही भले

हाल ही में बदायूं जिले में हुई घटना की न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी बदनामी हुई है। अभी ये मामला भी ठंडा न हो पाया था कि एक दरिंदगी और हैवानगी का एक और मंजर हम सभी के सामने है। ये घटना किसी और राज्य की नहीं बल्कि आजकल अपनी कानून व शासन व्यवस्था को लेकर कटघरे में खड़े राज्य उत्तरप्रदेश की ही है। उत्तरप्रदेश सरकार अभी तक बदायूं मामले में लगे दागों को अपने दामन से साफ नहीं कर पाई कि बरेली में हैवानियत ने फिर अपने पैर पसार दिए। यहां की घटना में एक लड़की को बलात्कार के बाद तेजाब पिला दिया गया और फिर गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी गई। हैवानियत का यह आलम यहीं खत्म नहीं हुआ, इसके बाद लड़की के चेहरे पर तेजाब डालकर उसे भी बिगाड़ दिया गया। 
इस घटना ने जहां सरकार व कानून व्यवस्था पर तमाम तरह के सवाल खड़े किए हैं, वहीं आज के युवाओं की मानसिकता व उनके गिरते नैतिक स्तर, उनकी परवरिश पर भी उंगली उठाई है। आखिर आजकल के युवाओं को किस तरह की परवरिश मिल रही है जो उनकी मानसिकता पर इस तरह की हैवानियत हावी हो रही है। जब लड़की के साथ यह घटना हुई उस समय पुलिस व कानून व्यवस्था कहां थी? पहले से कटघरे में खड़ी कानून व्यवस्था फिर कैसे इतनी लापरवाह हो गई कि उसी राज्य में एक बार फिर हैवानियत की सारी हदें पार हो गईं। आखिर क्या हुआ है हमारी कानून व्यवस्था को। क्या इस देश की आधी आबादी को सुरक्षा प्रदान करना हमारे देश की कानून व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आता? और अगर आता है तो बार-बार देश के विभिन्न हिस्सों से हैवानियत की ऐसी दास्तां सामने क्यों आ रही है? आखिर क्यों देश की आधी आबादी अपना जीवन दहशत के साये में जीने को मजबूर है? इन सब सवालों के जबाव कौन देगा?
पुलिस और कानून व्यवस्था की बात अगर हम छोड़ दें तो बात करें इस तरह की घटनाओं को अन्जाम देने वाले लोगों की मानसिकता की, तो क्या यही हमारी आधुनिकता है। क्या हमारी आधुनिक सोच हमें हैवान बनना सिखा रही है? क्या आधुनिकता का ये माहौल हमारे देश के युवाओं को भटका रहा है? क्या आधुनिक होने का मतलब हैवान होना है तो इससे तो हम पिछड़े ही भले। आधुनिक होती आज की जीवन शैली में माता-पिता अपने बच्चों पर ध्यान देना भूल गए हैं। आज उन्होंने अपने बच्चों को पूरी फ्रीडम दे रखी है। इस फ्रीडम का लाभ उठा कर युवा निरंतर पथभ्रष्ट हो रहे हैं, इस ओर हमारा ध्यान नहीं जा रहा और जब ध्यान जाता है तब बहुत देर हो चुकी होती है। हमारी पुलिस व कानून व्यवस्था को महिलाओं की सुरक्षा के लिए सशक्त होना ही होगा। जितना जरूरी ये है उतना ही जरूरी है कि हम अपने बच्चों व रिश्तेदारों पर नजर रखें। उनकी कुंठित मानसिकता से उन्हें उबारने की कोशिश करें। उनके व्यवहार में आ रहे बदलावों की जांच करें और आवश्यकता पडऩे पर उनका उचित इलाज भी कराएं। क्योंकि इस तरह की घटनाओं को अन्जाम देने वाले लोग निश्चित रूप से मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं कहे जा सकते। अगर वे मानसिक रूप से स्वस्थ होते तो इस तरह की हैवानियत का परिचय न देते। 
बदलते समय के साथ आधुनिक होना बुरी बात नहीं है लेकिन आधुनिकता का लबादा ओढ़ते हुए हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कहीं कहीं हमारी आधुनिकता हमें पतन के मार्ग पर तो नहीं ले जा रही। आधुनिकता की आड़ में हैवानियत का चोला ओढऩा कतई तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता। इस तरह की घटनाओं के बारे में जानकर मन स्वत: ही ये प्रश्न करने लगता है कि आखिर किस तरफ जा रही है हमारी सोच, हमारी परवरिश। अगर ये सब आधुनिकता की देन है तो इससे तो हम पिछड़े ही भले। 
पुलिस व कानून व्यवस्था तथा अच्छी परवरिश के अलावा अगर किसी चीज पर नियंत्रण स्थापित करने की जरूरत है तो वह है टीवी व इंटरनेट। अभिभावकों को अपने बच्चों को इंटरनेट के गलत प्रयोग पर नियंत्रण स्थापित करना चाहिए। साथ ही साथ टेलीविजन पर प्रकाशित कार्यक्रमों के लिए भी निश्चित मानदंड तय होने चाहिए। ताकि पारिवारिक व घरेलू कहे जाने वाले कार्यक्रम पारिवारिक ही लगें, अश्लील नहीं। आज पारिवारिक कहे जाने वाले कार्यक्रमों में किस तरह से अश्लीलता परोसी जा रही है, इससे हम सब वाकिफ हैं ही। भले ही कार्यक्रम देखते समय हमें महसूस न हो पर इन सबका असर कहीं न कहीं हमारी मानसिकता पर जरूर पड़ता है और जिनकी परिणति होती है इस तरह की घटनाओं में। इसलिए इस तरह की घटनाओं पर लगाम कसने की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं बल्कि हम सबकी है, जिसे हम अपनी प्रभावशाली भागीदारी से निभा सकते हैं।  

Friday, May 30, 2014

कब तक रहेंगी ये सिसकियां...

आज हमारा समाज काफी उन्नति कर रहा है। विश्व मंच पर भारत की सशक्त उपस्थिति हमारे उन्नत और विकासशील होने का प्रमाण दे रही हैं। हमारे देश में भी लड़कियां पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं। ये सब बातें पढ़-सुन कर मन बहुत खुश हो जाता है लगता है जैसे अब हमारे देश की आधी आबादी के हाथ मजबूत हैं। लेकिन जैसे किसी महिला के साथ हुए अत्याचार या बलात्कार की खबर पढ़ती हूं उपरोक्त सारी बातें किसी परी कथा जैसी लगने लगती हैं जिनका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। 
उत्तरप्रदेश के बदायूं जिले में दो चचेरी बहनों के बलात्कार के बाद उन्हें फांसी पर लटकाने की घटना ने साबित कर दिया है कि हमारे देश में परिस्थितियां अभी बदली नहीं हैं। हालांकि दामिनी और गुड़िया के साथ हुई घटनाओं के बाद देश में बदलाव की उम्मीद जरूर की जा रही थी लेकिन उसके बाद विभिन्न क्षेत्रों में कई बालिग व नाबालिग लड़कियों के साथ हुई घटनाओं और बदायूं की इस घटना ने साफ़ कर दिया है कि हमारे देश में हालात अभी इतनी जल्दी नहीं बदलने वाले। हम अभी अपनी बहन-बेटियों को सर उठाकर सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं देना चाहते। अभी हमारे देश की नारी शक्ति को यूं ही पुरुष के वर्चस्व के आगे अपना अस्तित्व कुर्बान करते चले जाना है। 
महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों पर अगर एक नजर डालें तो हमें उसमें सबसे दुखद पहलू ये दिखाई देता है कि उन पर हो रहे अत्याचारों के लिए  बाहर वाले कम और उनके अपने कहे जाने वाले लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं। आज एक बेटी अपने पिता, चाचा या पिता तुल्य अन्य किसी रिश्तेदार के संरक्षण में सुरक्षित नहीं। एक बहन के विश्वास को उसके भाई कहलाने वाले लोग लगातार चोट पहुंचा रहे हैं। और तो और अगर हम बात करें घरेलू हिंसा की तो एक स्त्री जो अपना परिवार, अपनी पहचान और अपने सपने छोड़ कर जिस पति की पहचान को अपना कर सारा जीवन उसके नाम कर देती है तो वो पत्नी भी घर की चहारदीवारी में सुरक्षित नहीं है। हम पाने आसपास नजरें दौड़ाएं तो हमारे आधुनिक समाज में कई घर ऐसे मिल जायेंगे जहां महिलाएं बिना किसी जुर्म के अपने पति की मार खाने को विवश हैं। उनका दोष है तो सिर्फ इतना कि उनके पतियों को शराब पीकर अपने झूठे अहं को साबित करने की बीमारी है। कभी अपने बच्चों की ममता में तो कभी माता-पिता की इज्जत के लिए पति के लाख अत्याचार सहते हुए भी पत्नी इस बंधन में बंधी रहने को विवश है। क्योंकि शादी के बाद हमारे समाज में बेटियां परायी जो हो जाती हैं। चाहे पति कितने ही अत्याचार करे पर शादी के बाद उसका घर छोड़ना गुनाह है और ऐसा गुनाह करने वाली स्त्रियों को तो अपने माता-पिता के घर में भी पनाह नहीं मिलती। वे भी समाज के डर से बेटियों को समझा- बुझा कर वापस पति के अत्याचार सहने के लिए भेज देते हैं। कुछ महिलाएं जो अपने पति और माता-पिता दोनों का घर छोड़ स्वतंत्र  जीवनयापन करने की सोचती भी हैं तो उन्हें हम में से ही कई लोग चैन से जीने नहीं देते। 
कुछ इस तरह के हालात बलात्कार पीड़ितों के भी हैं। इस तरह की अनहोनी होने के बाद आज भी कई लोग दोषियों को सजा दिलवाने से डरते हैं। अपने मान-सम्मान की खातिर स्वयं मां-बाप अपनी बेटी के सम्मान से खिलवाड़ करने वालों को आज़ाद छोड़ देते हैं किसी और की बेटी के साथ खिलवाड़ करने के लिए। आखिर इसमें पीड़ित लड़की का क्या दोष होता है जो उसे पर्दों में रखा जाता है। हर पल उसे ये एहसास कराया जाता है कि जैसे उसने ही कोई गुनाह किया हो। बलात्कारी तो एक बार  सम्मान छीनता है पर हमारा समाज और लड़की का परिवार हर पल उसके सम्मान पर आघात करते हैं।        
इन सब घटनाओं को देखकर मन उचट जाता है और मैं खुद से ही पूछती हूं कि कब तक हमारे देश की आधी आबादी यूं ही सिसकती रहेगी, कब तक अपने साथ हो रहे खिलवाड़ों को यूं ही सहेगी ? समाज के ये कैसे बंधन हैं, जो औरतों को जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर कर देते हैं। आखिर कब हमारे देश में महिलाओं को भी फैसले लेने और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का अधिकार मिलेगा?
शायद तब तक जब तक औरत ही औरत की दुश्मन बनी रहेगी। क्योंकि आधी आबादी के  साथ हो रहे अत्याचारों के लिए पुरुष से ज्यादा महिलाएं स्वयं दोषी हैं। वे दोषी हैं क्योंकि वे सब कुछ चुपचाप सह रही हैं, वे दोषी हैं क्योंकि महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार में उसकी साथी बनने की बजाय महिला ही उसकी आवाज को दबाने में अहम भूमिका निभाती है। इन सबके साथ-साथ जब तक समाज व कानून महिलाओं के प्रति अपने उत्तरदायित्व को नहीं समझेगा, तब तक उनकी नियति में अत्याचार सहना ही लिखा रहेगा।      

Saturday, May 24, 2014

मोदी जी आपसे कुछ उम्मीदें हैं.…

जनता ने एक  बार फिर अपनी ताकत दिखा दी और बरसों से सत्ता पर काबिज पार्टी कांग्रेस को एक झटके में सिरे से नकार दिया। बीते दिनों जो नमो नमो लहर पूरे हिंदुस्तान में उठ रही थी उस लहर को लोकसभा जैसे विशाल समुद्र का स्थायित्व मिल गया। यह जीत मोदी लहर का परिणाम थी या इसके पीछे कोई और वजह थी ये तो सियासी लोग ही समझें। लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों ने साबित कर दिया कि चाहे शाषक कितना ही ताकतवर क्यों न हो, जनता में आज भी उसकी जड़ें हिलाने की सामर्थ्य है।   
खैर, हार-जीत की बातें तो अब पुरानी हो गयीं है इसलिए 'बीती ताहि बिसारी दे' की नीति का अनुसरण करते हुए आगे वाले कल के सपने बुनते हैं। और आने वाले कल में सबसे ज्यादा उम्मीदें हमें मोदी जी से है। कांग्रेस के दस साल के लगातार शासन के बाद देश की अर्थव्यवस्था में आये उतार-चढ़ाव,  महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अव्यवस्था जैसी स्थितियों से उबारने का जिम्मा अब नरेंद्र मोदी का ही है। जो बड़े-बड़े सपने उन्होंने देश की जनता को दिखाए हैं उन्हें हक़ीक़त बनाने का कारवां भी अब मोदी के ही कांधों पर है।        
मोदी जी से सबसे ज्यादा उम्मीदें युवा वर्ग को ही है। गुजरात के जिस विकास को आधार बनाकर मोदी जी चुनाव में उतरे थे उस विकास की पूरे देश के युवाओं को दरकार है। विकास चाहिए रोजगारपरक व्यवस्था का, विकास चाहिए चरमराती शिक्षा व्यवस्था का, विकास चाहिए मूलभूत व ढांचागत सुविधाओं का, विकास की दरकार है गरीबी में अपनी प्रतिभा को दम तोड़ते हुए देखने को विवश होती भारत की अनेक प्रतिभाओं को, विकास चाहिए संसाधनों के अभाव में अपनी दक्षता से दूसरे देशों को उन्नत करते भारत के प्रतिभावान युवाओं को, विकास चाहिए देश के गांवों को जहां आज भी बिजली, सड़क, शिक्षण संस्थान और अस्पतालों के अभाव में लाखों लोग अपने सपने और ज़िन्दगी से हार रहे हैं,  नौजवानों के साथ-साथ विकास चाहिए उन नौनिहालों को भी जिनका बचपन भी उनका अपना नहीं रह गया, विकास चाहिए उन मांओं को भी जो उचित सुविधाओं के अभाव में कुपोषित बच्चों को जन्म देने के लिए मजबूर हैं। इन  उम्मीदों के अलावा भी मोदी जी हमें आपसे कुछ उम्मीदें हैं। 
उम्मीदों की इस फेहरिस्त में अगली उम्मीद है देश के मुस्लिम व अल्पसंख्यक वर्ग को, जिन्हें डर सता रहा हैं कि कहीं मोदी सरकार में उनकी उपेक्षा तो नहीं हो जाएगी। कहीं चुनाव जीतते ही मोदी कट्टर हिन्दू तो नहीं हो जाएंगे। इसलिए मोदी जी आपको इस वर्ग के डर को दूर कर इनके हित के बारे में भी सोचना होगा। 
सबसे जरूरी और अहम काम जो आपको करना है वो ये कि देश को दीमक की तरह खोखला करने वाली महामारी भ्रष्टाचार से आपको देश को मुक्त कराना होगा, भ्रष्ट लोगों को सजा दिलवाकर विदेशी बैंकों में जमा कला धन वापस लाना होगा और ये सारा धन आपको देश के समग्र विकास में लगाना होगा। इन सबसे भी पहले आपको ये सुनिश्चित करना होगा कि देश के हर गरीब को कम से कम दो वक़्त की रोटी जरूर मिल जाए, इतनी कोशिश तो मोदी जी को करनी होगी कि पेट भरने के लिए किसी गरीब का बचपन न झुलसने पाए। 
माना मोदी जी हमें आपसे उम्मीदें बहुत हैं। लेकिन इन उम्मीदों का दामन थामना भी हमें आपने ही सिखाया है। चुनावों से पहले किये गए आपके वादों ने ही हमारी उम्मीदों में रंग भरा है। मोदी जी हमें आपसे जो भी उम्मीदें हैं आप कोशिश करिएगा कि आप उन्हें पूरी कर पाएं। कहीं ऐसा न हो कि ये उम्मीदें वक़्त के तूफानों से टकराकर बिखर जाएं और हम हमेशा की तरह खाली हाथ ही रह जाएं। उम्मीदों के टूटने का दर्द बहुत भयंकर होता है। यह तो आप अपनी जीत के बाद जान ही चुके होंगे। यह जनता के उम्मीदों के टूटने की सिहरन ही थी जिसने देश की सबसे बड़ी पार्टी को विपक्ष में बिठाने के काबिल भी नहीं समझा। मोदी जी हमें आपसे उम्मीद है कि आप हमारी हर उम्मीद पर खरे उतरेंगे और अगले लोकसभा चुनावों में भी डंके की चोट पर जनता से वोट मांगेंगे। 

Friday, May 16, 2014

क्या लड़की कोई वस्तु है ?

लोग कहते हैं हम आधुनिक हो गए गए हैं। आज लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं। पर क्या ये बात पूरी तरह सच है। शायद नहीं। मुझे तो ऐसा नहीं लगता। हुआ यूं कि हमारे पड़ोस में एक लड़की के घरवालों ने ससुराल की तरफ से कार और अन्य मांगों के चलते रिश्ता तोड़ दिया। मुझे तो लगा उनके इस फैसले की तारीफ होगी कि उन्होंने दहेज़ के लालची लोगों के आगे झुकने की अपनी बेटी के सम्मान की रक्षा के लिए रिश्ता तोड़ दिया। उनके इस फैसले के बाद मेरी नजर में उस परिवार की इज्जत बहुत बढ़ गयी लेकिन समाज में उस परिवार की इज्जत की ऐसे धज्जियां उड़ाई जा रही हैं जैसे उन्होंने न जाने कितना बड़ा गुनाह कर दिया। चारों तरफ  शोर मचा है कि लड़की इतनी पढ़ी-लिखी है इतना ज्यादा कमाती है अगर उसकी तनख्वाह के पैसे ही जोड़कर लड़की का रिश्ता बचा लेते तो क्या जाता ? आखिर इतनी कंजूसी किस काम की ? लड़की के घरवालों को ऐसा नहीं करना चाहिए था। 
अरे माना कि वो दीदी अच्छा कमा लेती हैं और उनके पैसों से उनके ससुराल वालों की मांग आसानी से पूरी की जा सकती थी। लेकिन ये  तो कोई बात नहीं हुई कि अगर लड़की कमाती है उसके घर वाले लालची लोगों के आगे झुककर अपनी बेटी का जीवन नरक बना दें। मैंने जब इस फैसले की सराहना करते हुए लोगों को समझाने की कोशिश कि तो मुझे जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारे समाज के पढ़े-लिखे आधुनिक कहे जाने वाले लोग मेरी बात का विरोध कर रहे हैं । मुझे बच्ची कहकर चुप कराया जा रहा  है लेकिन मैं जानना चाहती हूं कि जो बात मैं छोटी होकर समझ पा रही हूँ उसे बड़े लोग क्यों नहीं समझ पा रहे ? क्यों हर बार दहेज़ देकर लड़की के आत्मसम्मान को कुचला जाता है ? क्या वह मनुष्य नहीं कोई वस्तु है जिसकी हर बार खरीद-फरोख्त होती है और इस सौदेबाजी के बाद भी वह कभी सुखी नहीं रह पाती। जब तक उसे सामान समझकर बेचा जायेगा मेरे ख्याल से वो कभी सुखी हो भी नहीं पायेगी। क्यों मेरे आधुनिक समाज के ये आधुनिक लोग इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं? आज का समाज इतना आगे निकल चुका है, परंतु फिर भी आधी आबादी के मामले में हमारा समाज क्यों पुराने रिवाजों को ही मानता है? क्यों हमारी सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों के लिए बनाए गए रिवाजों में कोई परिवर्तन नहीं हुए? 
महिलाओं के विकास की ओर बढ़ते कदम तथा बदले रूप-रंग को देखकर ऊपर से सबको भ्रम हो रहा है कि आधुनिक महिलाएं पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। वो जैसा चाहती हैं, वैसा ही करती हैं। उन्होंने अपने जीवनशैली अपनी इच्छानुसार बनाई हुई है। जीवन के हर क्षेत्र में मिल रही कामयाबी इस बात की गवाह है कि अब हमारा समाज पुरुष प्रधान नहीं रहा। आधी आबादी को उसके हिस्से के अधिकार मिल रहे हैं। लेकिन इस तरह की घटनाएं देखने-सुनने बाद मन में कई सवाल उठते हैं- क्या सच में आधी आबादी को वह मिला है, जिसकी वह हकदार है या फिर सागर में से कुछ बूंदें उन्हें देकर बहला दिया गया है? क्या  होना जुर्म है? क्या विवाह जैसा पवित्र बंधन लड़की के लिए सिर्फ उसकी खरीद-फरोख्त की रस्म है? इस रस्म में पवित्रता कहां बची? पवित्रता तो छोड़िये जनाब क्या इस सौदेबाजी में लड़की का खुद का अस्तित्व कहीं बचा है? कब तक हम इन खोखले व जर्जर हो चुके रिवाजों से बंधे रहेंगे? आइये मिलकर इसका जवाब खोजें।     

Thursday, April 10, 2014

खुशी तेरे रंग निराले

खुशी तेरे भी कई अनोखे 
अजब रंग हैं निराले। 
पता नहीं कब कहां से 
तू आकर गले लगा ले। 
यूं तो खुशी, खुशी ही 
होती है, पर 
हर किसी के लिए इसके 
मायने अलग होते हैं। 
देखा मैंने एक बच्चे को 
कागज की नाव तैराकर 
खुश होते 
तो कहीं लोग महलों में 
भी नहीं खुश होते। 
किसी के लिए बारिश की  
पहली बूंद बन जाती 
है ख़ुशी का अफ़साना 
तो कोई भीगकर पूरे 
सावन में भी नहीं गा 
पाता खुशी का तराना। 
खुश है कोई सड़कों पर 
भी रात गुजारकर 
तो कहीं कोई खुश है 
इन्हीं लोगो की 
छोटी सी दुनिया उजाड़कर। 
खुश है कोई हाथों में 
मेहंदी रचाकर, तो वहीं 
खुश है कोई उसको 
बंधनों में बांधकर। 
खुश है कोई पहली बार 
रसोई बनाकर, तो 
खुश है कोई किसी के 
मुहं से निवाला छीनकर। 
खुश है मजदूर किसी के 
सपनों का घर बनाकर 
तो खुश है कोई उसी का 
आशियाना तोड़कर। 
खुश है कोई परायों को 
भी अपना बनाकर 
तो खुश है कोई अपनों को          
ही वृद्धाश्रम भेजकर। 
खुश है डॉक्टर किसी 
का जीवन बचाकर 
तो खुश है कोई किसी 
को गाडी से कुचलकर। 
खुश है किसान सबके लिए 
अन्न उगाकर 
तो खुश है कोई उसी की 
जमीन हथियाकर। 
खुश है कोई पहली बार 
नौकरी पाकर 
वहीं खुश है कोई लोगों को 
बेरोजगार बनाकर। 
खुश है कोई दूसरों का 
दर्द बांटकर 
तो खुश है कोई किसी की 
मुस्कान छीनकर। 
खुशी क्यों हैं तेरे इतने ढंग 
क्या सभी के लिए नहीं हो 
सकता खुशी का एक रंग ?

Wednesday, April 9, 2014

बारिश की बूंदें

कितनी अपनी कितनी सच्ची 
लगती हैं यह नन्हीं नन्हीं 
बारिश की बूंदें। 
कभी तन को तो कभी 
मन को भिगो जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 
कभी अपना होने का 
एहसास कराती हैं 
तो कभी एक पल में 
तन्हा छोड़ जाती हैं 
बारिश की बूँदें। 
कभी सपनों की रिमझिम 
फुहार बनकर आती हैं 
तो कभी उन्ही सपनो से 
मिला जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 
छल छल कल कल 
करती आपकी आपसे 
पहचान कराती  हैं 
बारिश की बूंदें। 
बारिश की बूंदों से 
रिश्ता पुराना था 
धीरे धीरे छूटा साथ 
इनसे मेरा 
पर अब भी मुझे 
अपना मानती हैं 
बारिश की बूंदें। 
मैं भले ही दूर रहूं इनसे 
पर अनजानी राहों पर 
आज भी मेरा साथ                                                        
निभाती हैं, ये पगली 
बारिश की बूंदें। 
तन्हा बैठी हूं, 
हूं खामोश आज 
ज़िन्दगी से शायद नाराज 
पर आज भी आकर 
बतियाती हैं मुझसे 
बारिश की बूंदें। 
ज़िन्दगी है जिंदादिली 
का दूसरा नाम 
आज भी मुझे यही 
एहसास कराती हैं 
बारिश की बूंदें। 
न जाने कब से 
ज़िन्दगी से दोबारा 
दोस्ती कराने में 
मेरा साथ निभा रही हैं 
बारिश की बूंदें। 
अपना पराया भूलकर
सबको ज़िन्दगी का 
नया पाठ पढ़ाती हैं 
बारिश की बूंदें।  
कागज़ की नाव को 
तैराकर पानी में 
कठिनाइयों से लड़ने 
का साहस दे जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 

Wednesday, April 2, 2014

उफ्फ यह सियासत।

उफ्फ यह सियासत। दिल कर रहा है कि जल्द ही चुनाव खत्म हों और नेताओं की बदजुबानी से छुटकारा मिले। चुनावी सरगर्मी के माहौल में सभी अपनी जुबान को खूब तकलीफ दे रहे हैं। लोकतंत्र के नाम पर चलने वाला यह मेला ख़त्म हो तो इन लोगों के अपशब्दों से लोगों का पीछा छूटे और टीवी चैनलों पर नेताओं की भिडंत रुके।

Saturday, March 15, 2014

होली के बदलते रंग

होली प्रेम से जुड़ी एक ऐसी अभिव्यक्ति का नाम है जो हमें नई सुगंध देती है। नई उमंग, नई तरंग, नई सुबह और सब कुछ नए रंगों से सजा होना ही होली की पहचान है। होली रंगों का त्योहार है, हंसी-खुशी का त्योहार है लेकिन आज होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक-संगीत की जगह फिल्मी गानों व डिस्को का प्रचलन बढ़ गया है। आजकल के बच्चे भी इस बदलते और आधुनिक होते माहौल के बीच होली के रंगों से दूर होते जा रहे हैं। देखती हूँ तो आश्चर्य होता है कि आजकल के बच्चों को होली जैसे मस्ती के त्योहार में कोई दिलचस्पी ही नहीं रह गयी है उनके लिए तो मोबाइल और लैपटॉप पर गेम खेलना ही जीवन जीने के सही मायने है। बच्चों का यह व्यवहार और त्योहारों से दूरी सिर्फ हमारे त्योहारों की रोनक ही खत्म नहीं कर रहे बल्कि बच्चों से उनका बचपन भी छीन रहे हैं। इसलिए त्यौहार मनाना और खासकर होली जैसा त्योहार मनाना सिर्फ हमारी संस्कृति की रक्षा के लिए ही नहीं बल्कि बच्चों के सर्वांगीर्ण विकास के लिए भी जरूरी है। 
आज होली केवल दिखावे का त्योहार बन कर रह गई है। आज यह त्योहार अपनी पुरानी पहचान को पूरी तरह से खो चुका है। आजकल केवल होली के रंग ही नहीं बदले बल्कि इस त्योहार के मायने भी पूरी तरह बदल चुके हैं। प्रेम और सद्भाव के इस पर्व को हमने नफरत व घृणा का पर्व बना दिया है। युवाओं के लिए तो यह पर्व लड़कियों के साथ छेडख़ानी का सुनहरा अवसर बनकर रह गया है। होली के नाम पर लड़कियों को परेशान करना आज आम बात हो गई है। नशीले पदार्थों का सेवन करके होली की आड़ में एक-दूसरे को परेशान करना, अपशब्द कहना इस त्योहार की पहचान बनकर रह गई है। किसी से बदला लेने के लिए इस दिन उस पर रंग की जगह कीचड़ फेंकना इस पर्व की पवित्रता को खत्म करता जा रहा है। जुआ और सट्टेबाजी की परंपरा भी इस दिन की पहचान बनती जा रही है। होली प्रेम व सद्भाव का ही पर्व बना रहे इसके लिए जरूरी है कि हम होली के रंगों को न बदलने दें और फिर से एक ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करें जिसमें वही पुराना प्रेम, भाईचारा व सौहार्द विकसित हो सके जो कि हमारे इस पर्व की पहचान थी। नहीं तो हमारा ये पर्व अपना वास्तविक रूप खो देगा। अपने त्योहारों के वास्तविक रंगों से अलग होने के बाद अपनी सभ्यता व संस्कृति को बनाए रखना भी आसान नहीं होगा। इसीलिए हम सबकी ये पुरजोर कोशिश होनी चाहिए कि हम इस त्योहार को इसके रंगों से दूर न करें और मिल-जुलकर प्यार से सभी के साथ इस पर्व के रंग व खुशियां बांटें। 

होली के रंग

होली के रंगों से रंग लो जीवन 
प्यार के रंगों से भीगे तन मन 
इस होली आप पर बस रंगों की 
चारों तरफ से बरसात हो 
रंग गुलाल की खुशबू से 
महके आप सभी का जीवन। 
प्रेम का है त्योहार यह 
प्रेम से ही इसे मनाएं 
होली के रंगों में नफरत 
के सारे रंग भूल जाएं 
बस प्यार से गले मिलें और 
प्यार के ही रंगों में रंग जाएं 
होली के अवसर पर स्वीकार करें 
मेरा प्यार और अभिनंदन।   

आप सभी को होली की ढेरों शुभकामनाएं।

Friday, March 14, 2014

'मुझे मेरे पंख लौटा दो'

उन्मुक्त गगन में उड़ते पंछी 
शायद यही हमने देखा है 
लेकिन देखा आज एक पंछी 
जो उड़ नहीं सकता था गगन में 
पंख काट दिए थे शायद किसी ने 
उस बेजुबान के 
उड़कर ही अभिव्यक्त करता था 
वह अपने भावों को 
जीवन का हर सुख दुःख 
दिखता था उसकी उड़ान में 
उसकी उड़ान ही थी 
पहचान उसकी 
पर अब वो भी छिन गयी 
फड़फड़ाता रहा बहुत देर तक 
खुद ही लड़ता रहा अपने दर्द से 
लेकिन लड़ते लड़ते खुद से 
थक चुका था अब वह 
बिना पंखों के नहीं बचा 
उसके जीवन में उल्लास
जीने की चाह बहुत थी उसमें 
पर नहीं जी सकता था 
बिना पंखों के वह 
तड़पता रहा, बस कहता रहा 
लौटा दो मुझे पंख मेरे 
पर अनसुनी थी उसकी यह 
मूक पुकार 
कोई नहीं दे पाया उसे
उसके जीवन की उड़ान 
घिसट घिसट कर आया 
गाडी के सामने 
और कर दिया अपना 
जीवन कुर्बान 
सपने टूटने पर दर्द होता है 
यह तो जानती थी मैं 
पर बिना पंखों के जीवन जीना 
कितना मुश्किल है 
कैसे छोड़ने पड़ते हैं 
अपने अरमान 
अपने आप अपने अरमानों 
की क़ुरबानी देना 
नहीं है यह आसान 
बहुत दर्द सहकर ही 
उस पंछी ने यह कदम 
उठाया होगा 
यह आज जाना है। 



 

Monday, March 10, 2014

क्योंकि मैं स्त्री हूं

क्योंकि मैं स्त्री हूं 
इसलिए मुझे नहीं 
है कोई अधिकार 

जन्म से ही अपने 
माता पिता के लिए 
होती परायी हूँ। 
नाज़ों से पाला मुझे 
पर अब मुझे ही 
अपने से दूर करने की 
कवायद में जुटे हैं 
घर छोड़ जाना ही होगा मुझको 
नहीं इसमें चलेगी मेरी मर्जी 
निभाना होगा यह बंधन मुझे 
क्योंकि मैं स्त्री हूं। 

घर छोड़ आयी मैं अपना 
लेकर आयी साथ नए घर में 
खुशहाल ज़िन्दगी का सपना। 
पर जल्दी ही टूटा भ्रम मेरा 
पता चला अब मुझे, नहीं है 
मुझे कोई अधिकार 
अपनी ज़िन्दगी ही नहीं 
जी सकती अपनी मर्जी से 
इस पर तो हक़ ही नहीं मेरा 
मेरे साथ-साथ आखिर यह 
भी तो हो चुकी परायी
मैं ही नहीं हूं अपनी क्योंकि 
आखिर मैं एक स्त्री हूं। 

सपने टूटे, ख्वाहिशें छूटीं 
छूट गया अरमानों का साथ 
जब जिसने चाहा 
रौंदा मेरे अस्तित्व को 
कभी कभी तो मुझ पर 
टूटा जुल्मों का कहर। 
कह नहीं सकती अपनी पीड़ा 
किसी से, क्योंकि यह नहीं 
मेरे संस्कार। 
चुपचाप सहूं हर अत्याचार 
इसी में है मेरी शान 
सिखाया गया मुझको 
पति परमेश्वर होता है 
फिर क्यों वो ही मेरे 
अधिकार छीन लेता है  
क्या परमेश्वर ऐसा होता है?
या फिर मेरे लिए है परमेश्वर 
का यह रूप 
क्योंकि मैं स्त्री हूं। 

हक़ नहीं मुझे बीमार 
होने का या 
अपनी ज़िन्दगी में अपने 
लिए सपने संजोने का 
क्या यूँ ही खामोश बीतेगा 
जीवन मेरा 
या इसमें भी कभी भर 
पाऊँगी मैं कोई रंग? 
या बेरंग रह जायेगी मेरी 
यह ज़िन्दगी? 
क्या स्वेटर बुनते बुनते 
बुन पाऊँगी मैं अपने लिए 
सुनहरे सपने? 
क्या बर्तनों की खनक में 
कोई सुनेगा मेरी आवाज़ ?
या सुनकर भी एक बार फिर से 
अनसुनी कर दी जाउंगी 
क्योंकि मैं स्त्री हूँ।