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Tuesday, April 26, 2016

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Tuesday, February 9, 2016

तलाश रही हूं खुद को

तलाश रही हूं खुद को  
कौन हूं 'मैं'
'मैं ' हूं 'मैं ' या 
बस हूं नाम की 'मैं '
वजूद है मेरा कोई या 
बिन वजूद की हूं 'मैं'
तलाश रही हूं खुद को
कौन हूं 'मैं'
'मैं ' हूं 'मैं ' या 
बस हूं नाम की 'मैं '

'मैं ' में हूं कहां 'मैं '
जाने कहां खो गई 'मैं '
खो गई या थी ही नहीं 'मैं '
सपना थी या कोई खिलौना हूं 'मैं '
जो बिन चाभी के चलता है और 
अपने मालिक के ढंग में ढलता है 
तलाश रही हूं खुद को
कौन हूं 'मैं'
'मैं ' हूं 'मैं ' या 
बस हूं नाम की 'मैं '

अपने होने का मतलब 
अब तक न जान पाई हूं 
अपने वजूद को 
अब भी न पहचान पाई हूं 
अपनापन चाहा था जो 
अब भी न मिल पाया है 
अपने वजूद की तलाश ने 
आज फिर मुझे रुलाया है 
तलाश रही हूं खुद को
कौन हूं 'मैं'
'मैं ' हूं 'मैं ' या 
बस हूं नाम की 'मैं ' 

Friday, January 2, 2015

ख़ामोशी का मंज़र

दिल में उठी अजीब सी हलचल है
क्या इस बेचैनी का कोई हल है
नादाँ इस दिल में तूफ़ान उठते हैं
पलकों के नीचे अब सपने सजते हैं।
सपनों और पलकों के बीच न जाने
कितना ज्यादा फासला है जो अब भी
सपने हमारी पलकों से दूर रहते हैं।
दिल में बातें बहुत हैं पर सुनने वाला
कोई भी नहीं, इसलिए अब हम अपनी
दास्तां खुद ही खुद से कहते हैं।
खुद ही खुद से करते हैं बातें और अब
खुद ही हम अपना दर्द बांट लेते हैं।
ख़ामोशी, ख़ामोशी और ख़ामोशी ही है
पर अब हम इन खामोशियों में भी
न जाने कैसे इतना शोर सुन लेते हैं।

Friday, December 26, 2014

क्यों दिल का रोग लगाया हमने


अजब इस दिल की मुश्किल है
जिसको चाहा वही दिल से दूर है।
हमसफ़र के होते हुए भी ज़िन्दगी
की राहों में आज भी सिर्फ तन्हाई है।
तन्हाई की आदत यूं तो थी पहले भी
पर न जाने क्यों आज इस तन्हाई
ने दिल में कैसी पीर उठाई है।
शिकवा नहीं हमें किसी से भी
फिर भी अपने आप से गिला है
क्यों दिल को रोग लगाया हमने
जिसका हमें मिला ऐसा सिला है।
दोष न इसमें उनका न हमारा है
क्योंकि हमें यह हाल भी गवारा है।
दूर ही सही पर दिल को तसल्ली है
कि आखिर वो प्यारा प्यार हमारा है।

Thursday, December 4, 2014

याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना

याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना
वो तुम्हें देखकर मेरा खुद से ही नज़रें चुराना
महफ़िल के बीच छुपकर तुमसे नज़रें मिलाना

याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना।

याद है मुझे आज भी वहां मेरा वो देर से आना
बातें करते-करते तुम्हारी बातों में खो जाना।
तुमसे और बात करने के लिए मेरा ढूंढ़ना बहाना
याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना।
याद है मुझे अब भी तुम्हारा मेरा दिल धड़काना
याद है अब भी मुझे वो मेरा शर्म से नज़रें झुकाना।
याद है मुझे अब भी तुमसे हाल-ए-दिल छिपाना। याद है मुझे आज भी बारिश का दिन सुहाना। 

Sunday, September 14, 2014

अंधेरे रास्तों पर

जीवन में क्यों कोई राह नजर नहीं आती है ?
हर राह पर क्यों नई परेशानी चली आती है ?
जब जब चाहा भूल जाऊं अपनी उलझनों को 
तब तब एक और नई उलझन मिल जाती है। 
खुलकर जीना और हंसना मैं भी चाहती हूं 
पर ज़िन्दगी हर बार ही बेवजह रुला जाती है। 
पूछना चाहती हूं ज़िन्दगी से खता क्या है मेरी 
क्यों जीवन की राहें मेरी हो गयी हैं अंधेरी। 
अंधेरी राहों पर आखिर कब तक ऐसे चलूंगी 
एक दिन ढलती शाम के साथ मैं भी ढलूंगी। 
अंधेरे इन रास्तों पर न मंज़िल का ठिकाना है 
और न इस डगर पर जीने का कोई बहाना है। 
कैसे जिऊं मैं इन कठिन रास्तों पर चलकर
क्यों खुशियां नहीं आती अपना रास्ता बदलकर। 
ऐसा नहीं कि मैंने कोशिश नहीं की इन्हे बुलाने की 
पर जैसे खुशियां कसम खा चुकी हैं मुझे भुलाने की। 
जब जब चाहा जी लूं ज़िन्दगी मैं भी खुलकर। 
ज़िन्दगी ने दी गम की सौगात दोबारा हंसकर।

Saturday, September 6, 2014

मैं 'लड़की' हूं

जकड़ी हूं बंधन में 
सदियों से 
अब मुझे मुक्ति चाहिए। 
बंधन खोल सके जो 
आज़ादी दे मुझे 
वो शक्ति अब चाहिए। 
उड़ना चाहती हूं 
स्वच्छंद गगन में 
'पर' मुझे मेरे चाहिए। 
मैं लड़की हूं 
हां मैं लड़की हूं 
तो क्या हुआ 
जीना का हक़ मुझे भी चाहिए। 
अब न सहूंगी बंधन 
अब न उठाऊंगी रिवाजों की 
बेड़ियों का भार 
हां मुझे भी अब 
जीवन में बहार चाहिए।