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Friday, May 30, 2014

कब तक रहेंगी ये सिसकियां...

आज हमारा समाज काफी उन्नति कर रहा है। विश्व मंच पर भारत की सशक्त उपस्थिति हमारे उन्नत और विकासशील होने का प्रमाण दे रही हैं। हमारे देश में भी लड़कियां पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं। ये सब बातें पढ़-सुन कर मन बहुत खुश हो जाता है लगता है जैसे अब हमारे देश की आधी आबादी के हाथ मजबूत हैं। लेकिन जैसे किसी महिला के साथ हुए अत्याचार या बलात्कार की खबर पढ़ती हूं उपरोक्त सारी बातें किसी परी कथा जैसी लगने लगती हैं जिनका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। 
उत्तरप्रदेश के बदायूं जिले में दो चचेरी बहनों के बलात्कार के बाद उन्हें फांसी पर लटकाने की घटना ने साबित कर दिया है कि हमारे देश में परिस्थितियां अभी बदली नहीं हैं। हालांकि दामिनी और गुड़िया के साथ हुई घटनाओं के बाद देश में बदलाव की उम्मीद जरूर की जा रही थी लेकिन उसके बाद विभिन्न क्षेत्रों में कई बालिग व नाबालिग लड़कियों के साथ हुई घटनाओं और बदायूं की इस घटना ने साफ़ कर दिया है कि हमारे देश में हालात अभी इतनी जल्दी नहीं बदलने वाले। हम अभी अपनी बहन-बेटियों को सर उठाकर सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं देना चाहते। अभी हमारे देश की नारी शक्ति को यूं ही पुरुष के वर्चस्व के आगे अपना अस्तित्व कुर्बान करते चले जाना है। 
महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों पर अगर एक नजर डालें तो हमें उसमें सबसे दुखद पहलू ये दिखाई देता है कि उन पर हो रहे अत्याचारों के लिए  बाहर वाले कम और उनके अपने कहे जाने वाले लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं। आज एक बेटी अपने पिता, चाचा या पिता तुल्य अन्य किसी रिश्तेदार के संरक्षण में सुरक्षित नहीं। एक बहन के विश्वास को उसके भाई कहलाने वाले लोग लगातार चोट पहुंचा रहे हैं। और तो और अगर हम बात करें घरेलू हिंसा की तो एक स्त्री जो अपना परिवार, अपनी पहचान और अपने सपने छोड़ कर जिस पति की पहचान को अपना कर सारा जीवन उसके नाम कर देती है तो वो पत्नी भी घर की चहारदीवारी में सुरक्षित नहीं है। हम पाने आसपास नजरें दौड़ाएं तो हमारे आधुनिक समाज में कई घर ऐसे मिल जायेंगे जहां महिलाएं बिना किसी जुर्म के अपने पति की मार खाने को विवश हैं। उनका दोष है तो सिर्फ इतना कि उनके पतियों को शराब पीकर अपने झूठे अहं को साबित करने की बीमारी है। कभी अपने बच्चों की ममता में तो कभी माता-पिता की इज्जत के लिए पति के लाख अत्याचार सहते हुए भी पत्नी इस बंधन में बंधी रहने को विवश है। क्योंकि शादी के बाद हमारे समाज में बेटियां परायी जो हो जाती हैं। चाहे पति कितने ही अत्याचार करे पर शादी के बाद उसका घर छोड़ना गुनाह है और ऐसा गुनाह करने वाली स्त्रियों को तो अपने माता-पिता के घर में भी पनाह नहीं मिलती। वे भी समाज के डर से बेटियों को समझा- बुझा कर वापस पति के अत्याचार सहने के लिए भेज देते हैं। कुछ महिलाएं जो अपने पति और माता-पिता दोनों का घर छोड़ स्वतंत्र  जीवनयापन करने की सोचती भी हैं तो उन्हें हम में से ही कई लोग चैन से जीने नहीं देते। 
कुछ इस तरह के हालात बलात्कार पीड़ितों के भी हैं। इस तरह की अनहोनी होने के बाद आज भी कई लोग दोषियों को सजा दिलवाने से डरते हैं। अपने मान-सम्मान की खातिर स्वयं मां-बाप अपनी बेटी के सम्मान से खिलवाड़ करने वालों को आज़ाद छोड़ देते हैं किसी और की बेटी के साथ खिलवाड़ करने के लिए। आखिर इसमें पीड़ित लड़की का क्या दोष होता है जो उसे पर्दों में रखा जाता है। हर पल उसे ये एहसास कराया जाता है कि जैसे उसने ही कोई गुनाह किया हो। बलात्कारी तो एक बार  सम्मान छीनता है पर हमारा समाज और लड़की का परिवार हर पल उसके सम्मान पर आघात करते हैं।        
इन सब घटनाओं को देखकर मन उचट जाता है और मैं खुद से ही पूछती हूं कि कब तक हमारे देश की आधी आबादी यूं ही सिसकती रहेगी, कब तक अपने साथ हो रहे खिलवाड़ों को यूं ही सहेगी ? समाज के ये कैसे बंधन हैं, जो औरतों को जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर कर देते हैं। आखिर कब हमारे देश में महिलाओं को भी फैसले लेने और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का अधिकार मिलेगा?
शायद तब तक जब तक औरत ही औरत की दुश्मन बनी रहेगी। क्योंकि आधी आबादी के  साथ हो रहे अत्याचारों के लिए पुरुष से ज्यादा महिलाएं स्वयं दोषी हैं। वे दोषी हैं क्योंकि वे सब कुछ चुपचाप सह रही हैं, वे दोषी हैं क्योंकि महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार में उसकी साथी बनने की बजाय महिला ही उसकी आवाज को दबाने में अहम भूमिका निभाती है। इन सबके साथ-साथ जब तक समाज व कानून महिलाओं के प्रति अपने उत्तरदायित्व को नहीं समझेगा, तब तक उनकी नियति में अत्याचार सहना ही लिखा रहेगा।      

Saturday, May 24, 2014

मोदी जी आपसे कुछ उम्मीदें हैं.…

जनता ने एक  बार फिर अपनी ताकत दिखा दी और बरसों से सत्ता पर काबिज पार्टी कांग्रेस को एक झटके में सिरे से नकार दिया। बीते दिनों जो नमो नमो लहर पूरे हिंदुस्तान में उठ रही थी उस लहर को लोकसभा जैसे विशाल समुद्र का स्थायित्व मिल गया। यह जीत मोदी लहर का परिणाम थी या इसके पीछे कोई और वजह थी ये तो सियासी लोग ही समझें। लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों ने साबित कर दिया कि चाहे शाषक कितना ही ताकतवर क्यों न हो, जनता में आज भी उसकी जड़ें हिलाने की सामर्थ्य है।   
खैर, हार-जीत की बातें तो अब पुरानी हो गयीं है इसलिए 'बीती ताहि बिसारी दे' की नीति का अनुसरण करते हुए आगे वाले कल के सपने बुनते हैं। और आने वाले कल में सबसे ज्यादा उम्मीदें हमें मोदी जी से है। कांग्रेस के दस साल के लगातार शासन के बाद देश की अर्थव्यवस्था में आये उतार-चढ़ाव,  महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अव्यवस्था जैसी स्थितियों से उबारने का जिम्मा अब नरेंद्र मोदी का ही है। जो बड़े-बड़े सपने उन्होंने देश की जनता को दिखाए हैं उन्हें हक़ीक़त बनाने का कारवां भी अब मोदी के ही कांधों पर है।        
मोदी जी से सबसे ज्यादा उम्मीदें युवा वर्ग को ही है। गुजरात के जिस विकास को आधार बनाकर मोदी जी चुनाव में उतरे थे उस विकास की पूरे देश के युवाओं को दरकार है। विकास चाहिए रोजगारपरक व्यवस्था का, विकास चाहिए चरमराती शिक्षा व्यवस्था का, विकास चाहिए मूलभूत व ढांचागत सुविधाओं का, विकास की दरकार है गरीबी में अपनी प्रतिभा को दम तोड़ते हुए देखने को विवश होती भारत की अनेक प्रतिभाओं को, विकास चाहिए संसाधनों के अभाव में अपनी दक्षता से दूसरे देशों को उन्नत करते भारत के प्रतिभावान युवाओं को, विकास चाहिए देश के गांवों को जहां आज भी बिजली, सड़क, शिक्षण संस्थान और अस्पतालों के अभाव में लाखों लोग अपने सपने और ज़िन्दगी से हार रहे हैं,  नौजवानों के साथ-साथ विकास चाहिए उन नौनिहालों को भी जिनका बचपन भी उनका अपना नहीं रह गया, विकास चाहिए उन मांओं को भी जो उचित सुविधाओं के अभाव में कुपोषित बच्चों को जन्म देने के लिए मजबूर हैं। इन  उम्मीदों के अलावा भी मोदी जी हमें आपसे कुछ उम्मीदें हैं। 
उम्मीदों की इस फेहरिस्त में अगली उम्मीद है देश के मुस्लिम व अल्पसंख्यक वर्ग को, जिन्हें डर सता रहा हैं कि कहीं मोदी सरकार में उनकी उपेक्षा तो नहीं हो जाएगी। कहीं चुनाव जीतते ही मोदी कट्टर हिन्दू तो नहीं हो जाएंगे। इसलिए मोदी जी आपको इस वर्ग के डर को दूर कर इनके हित के बारे में भी सोचना होगा। 
सबसे जरूरी और अहम काम जो आपको करना है वो ये कि देश को दीमक की तरह खोखला करने वाली महामारी भ्रष्टाचार से आपको देश को मुक्त कराना होगा, भ्रष्ट लोगों को सजा दिलवाकर विदेशी बैंकों में जमा कला धन वापस लाना होगा और ये सारा धन आपको देश के समग्र विकास में लगाना होगा। इन सबसे भी पहले आपको ये सुनिश्चित करना होगा कि देश के हर गरीब को कम से कम दो वक़्त की रोटी जरूर मिल जाए, इतनी कोशिश तो मोदी जी को करनी होगी कि पेट भरने के लिए किसी गरीब का बचपन न झुलसने पाए। 
माना मोदी जी हमें आपसे उम्मीदें बहुत हैं। लेकिन इन उम्मीदों का दामन थामना भी हमें आपने ही सिखाया है। चुनावों से पहले किये गए आपके वादों ने ही हमारी उम्मीदों में रंग भरा है। मोदी जी हमें आपसे जो भी उम्मीदें हैं आप कोशिश करिएगा कि आप उन्हें पूरी कर पाएं। कहीं ऐसा न हो कि ये उम्मीदें वक़्त के तूफानों से टकराकर बिखर जाएं और हम हमेशा की तरह खाली हाथ ही रह जाएं। उम्मीदों के टूटने का दर्द बहुत भयंकर होता है। यह तो आप अपनी जीत के बाद जान ही चुके होंगे। यह जनता के उम्मीदों के टूटने की सिहरन ही थी जिसने देश की सबसे बड़ी पार्टी को विपक्ष में बिठाने के काबिल भी नहीं समझा। मोदी जी हमें आपसे उम्मीद है कि आप हमारी हर उम्मीद पर खरे उतरेंगे और अगले लोकसभा चुनावों में भी डंके की चोट पर जनता से वोट मांगेंगे। 

Friday, May 16, 2014

क्या लड़की कोई वस्तु है ?

लोग कहते हैं हम आधुनिक हो गए गए हैं। आज लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं। पर क्या ये बात पूरी तरह सच है। शायद नहीं। मुझे तो ऐसा नहीं लगता। हुआ यूं कि हमारे पड़ोस में एक लड़की के घरवालों ने ससुराल की तरफ से कार और अन्य मांगों के चलते रिश्ता तोड़ दिया। मुझे तो लगा उनके इस फैसले की तारीफ होगी कि उन्होंने दहेज़ के लालची लोगों के आगे झुकने की अपनी बेटी के सम्मान की रक्षा के लिए रिश्ता तोड़ दिया। उनके इस फैसले के बाद मेरी नजर में उस परिवार की इज्जत बहुत बढ़ गयी लेकिन समाज में उस परिवार की इज्जत की ऐसे धज्जियां उड़ाई जा रही हैं जैसे उन्होंने न जाने कितना बड़ा गुनाह कर दिया। चारों तरफ  शोर मचा है कि लड़की इतनी पढ़ी-लिखी है इतना ज्यादा कमाती है अगर उसकी तनख्वाह के पैसे ही जोड़कर लड़की का रिश्ता बचा लेते तो क्या जाता ? आखिर इतनी कंजूसी किस काम की ? लड़की के घरवालों को ऐसा नहीं करना चाहिए था। 
अरे माना कि वो दीदी अच्छा कमा लेती हैं और उनके पैसों से उनके ससुराल वालों की मांग आसानी से पूरी की जा सकती थी। लेकिन ये  तो कोई बात नहीं हुई कि अगर लड़की कमाती है उसके घर वाले लालची लोगों के आगे झुककर अपनी बेटी का जीवन नरक बना दें। मैंने जब इस फैसले की सराहना करते हुए लोगों को समझाने की कोशिश कि तो मुझे जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारे समाज के पढ़े-लिखे आधुनिक कहे जाने वाले लोग मेरी बात का विरोध कर रहे हैं । मुझे बच्ची कहकर चुप कराया जा रहा  है लेकिन मैं जानना चाहती हूं कि जो बात मैं छोटी होकर समझ पा रही हूँ उसे बड़े लोग क्यों नहीं समझ पा रहे ? क्यों हर बार दहेज़ देकर लड़की के आत्मसम्मान को कुचला जाता है ? क्या वह मनुष्य नहीं कोई वस्तु है जिसकी हर बार खरीद-फरोख्त होती है और इस सौदेबाजी के बाद भी वह कभी सुखी नहीं रह पाती। जब तक उसे सामान समझकर बेचा जायेगा मेरे ख्याल से वो कभी सुखी हो भी नहीं पायेगी। क्यों मेरे आधुनिक समाज के ये आधुनिक लोग इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं? आज का समाज इतना आगे निकल चुका है, परंतु फिर भी आधी आबादी के मामले में हमारा समाज क्यों पुराने रिवाजों को ही मानता है? क्यों हमारी सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों के लिए बनाए गए रिवाजों में कोई परिवर्तन नहीं हुए? 
महिलाओं के विकास की ओर बढ़ते कदम तथा बदले रूप-रंग को देखकर ऊपर से सबको भ्रम हो रहा है कि आधुनिक महिलाएं पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। वो जैसा चाहती हैं, वैसा ही करती हैं। उन्होंने अपने जीवनशैली अपनी इच्छानुसार बनाई हुई है। जीवन के हर क्षेत्र में मिल रही कामयाबी इस बात की गवाह है कि अब हमारा समाज पुरुष प्रधान नहीं रहा। आधी आबादी को उसके हिस्से के अधिकार मिल रहे हैं। लेकिन इस तरह की घटनाएं देखने-सुनने बाद मन में कई सवाल उठते हैं- क्या सच में आधी आबादी को वह मिला है, जिसकी वह हकदार है या फिर सागर में से कुछ बूंदें उन्हें देकर बहला दिया गया है? क्या  होना जुर्म है? क्या विवाह जैसा पवित्र बंधन लड़की के लिए सिर्फ उसकी खरीद-फरोख्त की रस्म है? इस रस्म में पवित्रता कहां बची? पवित्रता तो छोड़िये जनाब क्या इस सौदेबाजी में लड़की का खुद का अस्तित्व कहीं बचा है? कब तक हम इन खोखले व जर्जर हो चुके रिवाजों से बंधे रहेंगे? आइये मिलकर इसका जवाब खोजें।