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Saturday, June 21, 2014

तितली सी चंचलता

तितली सा चंचल बन मन मेरा 
उड़ना चाहता है। 
नन्हीं सी तितली रानी देख तुम्हें 
मन मेरा हर्षाता है। 
उड़कर तेरी तरह मन मेरा फूलों पर 
मंडराना चाहता है। 
डाल-डाल पर बैठकर यौवन मेरा
इठलाना चाहता है। 
रंग-बिरंगे पंख हों मेरे दिल यही 
मांगना चाहता है। 
कोमल सी काया चंचल नैन मन 
मेरा पाना चाहता है। 
तितली आज मन मेरा तुझ जैसा 
इतराना चाहता है। 
बच्चों के साथ मन मेरा अठखेलियां 
करना चाहता है।    
सबके साथ घुल-मिल कर मन आज 
खेलना चाहता है। 
उडूं आज स्वच्छंद, मन मेरा बन्धन 
तोड़ना चाहता है। 
चंचल मन मेरा आज हर भेदभाव 
भूलना चाहता है। 
तितली सी चंचलता मैं मन मेरा 
खो जाना चाहता है।    

वे सुहाने दिन

याद  बहुत आते हैं 
बचपन के वो दिन 
 
वो अनमोल प्यारे 
न भूलने वाले पल 
 
कभी शरारत में तो 
कभी अल्हड़पन में 
 
तो कभी किसी की 
मुस्कराहट वापस 
 
लाने के लिए खेले थे 
हम सबने जो खेल 
 
वो मीठी मीठी बातें 
वो दिल को छू जाने 
 
वाले प्यारे से बोल 
बचपन के उस प्यारे 
 
एहसास से भीग रहा 
है मेरा नादां मन 
 
दिल कर रहा है आज 
तोड़कर सारे बंधन 
 
जी लूं दोबारा अपने 
बचपन के सुनहरे पल 
 
वो मस्ती वो भोलापन 
कहलाता था जो बचपन 
 
जीवन के इस सुहाने दौर 
से गुजरे हैं हम सभी 
 
और याद भी आता है 
हम सबको अपना 
 
वो नन्हा सा बचपन 
वो तितलियों के पीछे 
 
भागना, वो चलते रिक्शॉ 
पर लटक जाना 
 
कागज की नाव और 
छोटी चीजों से खुश 
 
हो जाना, उड़ते जहाज 
को देख खुश होना, 
 
नए खिलौने देखकर 
मचल जाना और फिर 
 
नयी शरारतों से सबको 
हंसाना, गुदगुदाना 
 
वो परियों की कहानी 
सुनकर खुश हो जाना 
 
न बड़ी चाहतें न अरमान 
बस लोरी और माँ की 
 
दुलार ही थी दुनिया 
ऐसा ही तो था शायद 
 
हम सबका बचपन या 
उम्र का दौर सुहाना  
 
जाने क्यों बीत गए 
वो पल इतनी जल्दी 
 
क्यों खो गयी हमारी 
वो नन्ही दुनिया 
 
जब हमारा बचपन था 
हर गम से बेगाना।

Thursday, June 19, 2014

आखिर मिला क्या ?

आज के बदलते आधुनिक समय में हम सभी इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमारे पास हमारे मित्रों तथा संबंधियों के लिए तो दूर अपने बच्चों तक के लिए पर्याप्त समय नहीं है, जिसका परिणाम है हमारी आज की आक्रोशित युवा पीढ़ी। आज के युवा में सहनशक्ति व धैर्य जैसे गुण तो लेश मात्र भी नहीं बचे। बात-बात पर वे मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी ही एक घटना सामने आई है देश की राजधानी दिल्ली के बाहरी इलाके बख्तावरपुर गढ़ी गांव से, जहां एक युवा ने अपने लालच के चलते पहले अपनी पत्नी, साले और ससुर की हत्या की और फिर खुद को ही गोली मारकर अपनी जान ले ली। यह सब उसने सिर्फ इसलिए किया क्योंकि उसे ससुराल वालों से कार नहीं मिली थी। उन लोगों ने कुछ समय बाद कार देने की बात कही थी लेकिन वो युवा सब्र न कर सका और उसने इस आपराधिक घटना को अन्जाम दे दिया। लेकिन इतना सब करने के बाद उस युवा को क्या मिला? उसने तो स्वयं अपना जीवन तक गंवा दिया फिर इस अधैर्य और गुस्से का क्या मतलब?  
इस घटना के बाद एक बार फिर इस बात पर ध्यान देने की जरूरत महसूस की जा रही है कि क्यों आजकल युवा इतने अधीर होते जा रहे हैं? आखिर क्यों वे बात-बात पर अपना आपा खो रहे हैं? इस घटना के लिए जितनी दोषी हमारे समाज में व्याप्त दहेज़ जैसी कुप्रथा है उतना ही दोष बदलता सामाजिक परिवेश और कुंठित होती मानसिक स्थिति का भी है। आज हमारे समाज का माहौल पूरी तरह बदलता जा रहा है और इसका सबसे ज्यादा असर नयी पीढ़ी पर पड़ रहा है। यह गुस्सा कोई एक दिन की उपज नहीं होता,ये धीरे-धीरे युवाओं के दिलो-दिमाग में प्रवेश करता है और फिर एक दिन अचानक उनका पूरा जीवन बदल देता है। आक्रोश में आकर किसी अपराध को अन्जाम देने वाले अधिकतर युवा शुरुआत में गुस्सैल तथा चिड़चिड़े हो जाते हैं लेकिन परिवार वाले अक्सर इन बातों की अनदेखी कर इन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं देते। शुरुआत में देखा जाए तो यह सब मामूली ही लगता है। कभी परीक्षा में वांछित परिणाम नहीं आए, तो कभी प्रेम में असफलता, तो कभी दांपत्य जीवन के बीच बढ़ रही कड़वाहट तो कभी कॅरियर में मिली असफलता व्यक्ति के आक्रोश को इस हद तक बढ़ा देते हैं कि वह खुद ही अपनी जान ले लेता है। 
 युवाओं को इस मानसिक कुंठा से दूर रखने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि शुरू से ही उनकी परवरिश पर पूरा ध्यान दिया जाए। उनकी गतिविधियों का मूल्यांकन किया जाए तथा बचपन से ही उनमें किसी भी प्रकार की परिस्थिति से लड़ने का जज़्बा पैदा किया जाए। अगर अब भी युवाओं के भटकाव को सही दिशा नहीं मिली तो जल्द ही पूरा समाज दिशाहीन हो जाएगा जिसकी ख्वाहिश शायद हममें से किसी ने नहीं की होगी।  

Monday, June 9, 2014

बचपन की कैद

नन्हें नन्हें कांधों पर वजन उठाये 
कौन सी जंग लड़ रहे हैं ये  
ज़िन्दगी के मासूम सिपाही। 
क्या यही है इनके लिये 
ज़िन्दगी की अनमोल सौगात?
कब तक यूँ ही बोझा ढोयेंगे 
ये नन्हें-नन्हें कोमल हाथ?
क्या यही है इनके लिये 
ज़िन्दगी के असली मायने?
या देख पाएंगे ये भी कभी 
बचपन के सपने सुहाने?
गुड्डे-गुड़ियों का घर सजाने 
की नन्हीं सी उम्र में ये 
आशियाना किसी और का 
सजाते हैं। 
बस्ते का बोझ उठाने वाले हाथ 
ईंट-पत्थरों के बोझ के नीचे 
दबते जाते हैं। 
मासूम सी उम्र मे जाने कैसे 
गंभीर सितम भी हंसकर 
सह जाते हैं। 
खुद स्कूल जाने की उम्र में 
किसी और के बच्चों को स्कूल 
छोड़कर आते हैं। 
खिलौनों से खेलने के दौर 
 
में 
खुद किसी और के हाथ का 
खिलौना बन जाते हैं। 
सुहाने बचपन के सपने तो 
इनके लिए बेगाने हैं। 
सुख के दिन तो इनके लिये 
जैसे अनजाने हैं। 
छोटी सी उम्मीद पाली है मैने मन में 
कभी तो बहार आये इनके भी जीवन में 
खुशियों का आसमां न सही 
मुट्ठी भर जमीन ही मिल जाये 
इनको अपनी दुनिया सजाने को। 
बचपन के वो नटखट पल 
वो शरारतों भरी हलचल 
इन बाल मजदूरों को भी 
कभी अपना बना जाएं। 
आखिर कभी बचपन की खुशियां 
इनके हिस्से भी आएं।  
बचपन की गिरफ्त से आज़ाद ये पंछी 
फिर से बचपन की कैद में आ जाएं। 

Saturday, June 7, 2014

मंज़िल अभी दूर है...

हमारा देश लगातार आधुनिक हो रहा है और तकनीक विकास में भी हम किसी से पीछे नहीं हैं, इसी बात की पुष्टि करती है देश की राजधानी दिल्ली में शुरू हुई नई सुविधा। इसके तहत अब दिल्ली के 24 सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में ऑनलाइन पंजीकरण सेवा का लाभ लिया जा सकता है। इस सुविधा के तहत कोई भी व्यक्ति अपने घर से ही अगले 15 दिनों तक इलाज के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकता है और इसके बाद मरीज संबंधित अस्पताल के उस विभाग में सीधे जा सकता है जहां उसे इलाज कराना है।
इस सुविधा के तहत अब आपको ओपीडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए लम्बी कतारों में लगने जरूरत नहीं पड़ेगी और आप अपना काफी समय भी बचा पाएंगे। निश्चित रूप से यह सुविधा हमारे तकनीक के क्षेत्र में विकासशील होने का प्रमाण देती है और इससे कुछ लोगों को लाभ भी होगा। लेकिन इस सुविधा की मंज़िल अभी भी काफी लोगों से बहुत दूर है। इसका सबसे प्रमुख कारण इस सुविधा के प्रति जागरूकता का अभाव है और जागरूकता की ये कमी सिर्फ मरीजों में ही नहीं बल्कि अस्पताल प्रशासन में भी देखी जा सकती है।  मरीज अभी भी इस सुविधा का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। 
इस सुविधा का अगर दूसरा पहलू देखें तो हम पाएंगे कि ये सुविधा सिर्फ विशेष तबके को ही लाभ पहुंचा सकती है। क्योंकि भले ही हम कितने ही उन्नतशील हो गए हों लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में जाने वाले गरीब तबके के लिए अभी भी ऑनलाइन पंजीकरण की बात टेढ़ी खीर ही है। वे अभी इतने आधुनिक नहीं हुए हैं कि इस तरह की सुविधा से रुबरु हो सकें। सरकारी अस्पताल में आने वाले गरीब मरीजों को इससे कोई लाभ नहीं होने वाला। लगता है ये सुविधा मध्यम वर्ग उसमें भी खासकर उच्च मध्यम वर्ग को ध्यान में रखकर प्रदान  की गयी है। सरकार की यह सकारात्मक पहल एक तरह से कहीं न कहीं सब तरफ से दबाये जा रहे गरीबों के साथ नाइंसाफी  ही है। पहले ही उन्हें सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए काफी जद्दोजेहद करनी पड़ती थी अब ये समस्या और बढ़ जाएगी। गरीब मरीजों के साथ सरकारी अस्पतालों में हो रहे पक्षपात व दुर्व्यवहार के किस्से तो हम सभी सुनते-पढ़ते ही रहते हैं।  इस सुविधा के बाद ऑनलाइन पंजीकरण कराने वाले रोगी डॉक्टर को दिखाने की पंक्ति में पहले पहुंच जाएंगे और बेचारे कतारों में लगकर पंजीकरण कराने वाले गरीब रोगी घंटों इंतजार करने के बाद ही डॉक्टर को दिखा पाएंगे। ऐसे में तो साफ दिखता है कि इस सुविधा से निचले तबके को लाभ होने की बजाय नुकसान ही होगा। 
सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मिली ये सुविधा कुछ हद तक तारीफ के काबिल है  पर सभी पक्षों से इसका मूल्यांकन किया जाये तो ये सुविधा  गरीबों के साथ अन्याय है। इससे बेहतर तो अस्पतालों में डॉक्टर की संख्या, जांच उपकरणों के सही रख-रखाव और उनकी संख्या में वृद्धि, दवाइयों का प्रबंध तथा  अन्य मूलभूत व आवश्यक सुविधाओं में बढ़ोतरी करके सरकार गरीबों को ज्यादा लाभ पहुंचा सकती थी। माना तकनीकी के इस युग में तकनीकी की भाषा समझना जरूरी है लेकिन ये हमारी प्राथमिकता नहीं है। हमारी प्राथमिकता समय पर उचित इलाज व दवाइयों का मिलना है। अगर मरीजों की ये आवश्यकता ही पूरी नहीं हो सकती तो तकनीकी के विकास के बातें करना व्यर्थ है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बाकी सारी बातें धरी की धरी रह जाती हैं। इसलिए मैं तो यही कहना चाहूंगी कि सरकार ने शायद 'इंडिया' में रहने वाले कुछ लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर ये सुविधा दी है, इस सुविधा के मद्देनजर शायद 'भारत' में रहने वाली एक बहुत बड़ी आबादी को उपेक्षित कर दिया गया है। इसलिए मेरे अनुसार सुविधाओं की राह से मंज़िल अभी बहुत दूर है।    

Friday, June 6, 2014

अभी भी वक़्त है संभलने का

आजकल बेमौसम बरसात, अचानक आये आंधी-तूफान या भूकम्प से हम सभी आतंकित हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण हम सबका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। कब कौन सी प्राकृतिक आपदा हमारा सब कुछ तबाह करके चली जाएगी, हमें इसका अंदाजा तक नहीं है। हम सभी एक डर के साये में जीने को मजबूर हैं। इस डर के माहौल में हम प्रकृति को कोस रहे हैं, जो लगातार हमसे हमारे अपनों को छीन रही है लेकिन इन सबके बीच हम सबसे जरूरी बात भूल रहे हैं वो यह कि इसके जिम्मेदार भी हम खुद ही हैं। ये हमारा स्वार्थ ही था जिसके चलते हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया और आज प्रकृति हमारे साथ खिलवाड़ कर रही है। 
आज बेमौसम बरसात हो रही है और बारिश के दिनों में हमें बारिश के लिए तरसना पड़ता है। आज भी जब मैं कुछ साल पहले के अपने बचपन के दिन याद करती हूं तो मुझे याद आता है कि किस तरह हमारे स्कूल जाते-जाते ही झमाझम बारिश हो जाती थी और उस बारिश में भीगकर हम बहुत खुश होते थे। लेकिन अब बारिश के मौसम में हमें बारिश के लिए तरसना पड़ता है। आज हम प्रार्थना करते हैं कि यदि इंद्र देव की मेहरबानी हो तो हमें सूर्य देव के तीखे तेवरों और उनकी चढ़ती रश्मियों से थोड़ी देर राहत मिले। आज के हालत देखकर सोचती हूं कि कैसे कुछ ही समय में परिस्तिथियों में इतना फर्क आ गया ? पहले लोग अच्छे स्वास्थ्य के लिए सूर्य स्नान या सूर्य नमस्कार जैसी चीजों को महत्त्व देते थे लेकिन आज तो हमने सूर्य को भी इतना प्रदूषित कर दिया हैं कि अब उससे हमें फायदे की जगह नुकसान होने लगे हैं। 
ये सब परिणाम है हमारी स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं का, जिनकी पूर्ति के लिए हमने अंधाधुंध प्रकृति का शोषण किया। विकास के नाम पर लगातार नदियों, जंगलों, पहाड़ों और उद्यानों को नष्ट किया। इसके पीछे हमारे समाज के प्रबुद्ध वर्ग तर्क देते रहे कि विकास अपनी कीमत मांगता है लेकिन यह कैसा विकास है जो मानव के सर्वनाश का कारण बन रहा है। आज चारों ओर पृथ्वी पर ही रहे विनाश की चर्चा हो रही है। कहीं जंगलों में आग लग रही है तो कहीं भूकम्प ने मनुष्य जीवन को हिलाकर रख दिया है तो कहीं मनुष्य बाढ़ से ट्रस्ट है। इन हालातों को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यदि मनुष्य ऐसे ही निरंतर प्रकृति का दोहन करता रहा तो आने वाले समय में पूरी धरती नष्ट हो जाएगी। 
प्रकृति की इस दुर्दशा को देखते हुए इसके संरक्षण के लिए हमारे देश के कुछ लोगों ने वर्ष में एक बार पर्यावरण दिवस मनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का दायित्व उठाया है और यहां भी हालात बिलकुल ऐसे ही हैं जैसे हिंदी दिवस मनाने के हैं। साल में बस एक बार इनको बचाने का झुनझुना बजाकर हम खुद को सांत्वना दे रहे हैं। हम सिर्फ कुछ कार्यशालाओं और कार्यक्रमों का आयोजन कर अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि ये सिर्फ एक दिन की बात नहीं प्रकृति और उससे जुड़े मानव के सदा के संरक्षण का मसला है। ये प्रश्न है तो हमारे जलवायु और वायुमंडल में हो रहे परिवर्तनों का, जिसके लिए हम सभी दोषी हैं। सिर्फ एक दिन पर्यावरण दिवस मनाने से यह समस्या हल नहीं होने वाली, इसके लिए हम सभी के समग्र प्रयासों की आवश्यकता है। आवश्यकता है इस बात की कि हम सभी अपने-अपने स्तर पर इस प्रयास में अपनी भागीदारी निभाएं। अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है, यदि हम सभी सही मायनों में सफल प्रयास करना चाहें तो हम अब भी अपने विनाश को रोक सकते हैं।         

Tuesday, June 3, 2014

इससे तो हम पिछड़े ही भले

हाल ही में बदायूं जिले में हुई घटना की न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी बदनामी हुई है। अभी ये मामला भी ठंडा न हो पाया था कि एक दरिंदगी और हैवानगी का एक और मंजर हम सभी के सामने है। ये घटना किसी और राज्य की नहीं बल्कि आजकल अपनी कानून व शासन व्यवस्था को लेकर कटघरे में खड़े राज्य उत्तरप्रदेश की ही है। उत्तरप्रदेश सरकार अभी तक बदायूं मामले में लगे दागों को अपने दामन से साफ नहीं कर पाई कि बरेली में हैवानियत ने फिर अपने पैर पसार दिए। यहां की घटना में एक लड़की को बलात्कार के बाद तेजाब पिला दिया गया और फिर गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी गई। हैवानियत का यह आलम यहीं खत्म नहीं हुआ, इसके बाद लड़की के चेहरे पर तेजाब डालकर उसे भी बिगाड़ दिया गया। 
इस घटना ने जहां सरकार व कानून व्यवस्था पर तमाम तरह के सवाल खड़े किए हैं, वहीं आज के युवाओं की मानसिकता व उनके गिरते नैतिक स्तर, उनकी परवरिश पर भी उंगली उठाई है। आखिर आजकल के युवाओं को किस तरह की परवरिश मिल रही है जो उनकी मानसिकता पर इस तरह की हैवानियत हावी हो रही है। जब लड़की के साथ यह घटना हुई उस समय पुलिस व कानून व्यवस्था कहां थी? पहले से कटघरे में खड़ी कानून व्यवस्था फिर कैसे इतनी लापरवाह हो गई कि उसी राज्य में एक बार फिर हैवानियत की सारी हदें पार हो गईं। आखिर क्या हुआ है हमारी कानून व्यवस्था को। क्या इस देश की आधी आबादी को सुरक्षा प्रदान करना हमारे देश की कानून व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आता? और अगर आता है तो बार-बार देश के विभिन्न हिस्सों से हैवानियत की ऐसी दास्तां सामने क्यों आ रही है? आखिर क्यों देश की आधी आबादी अपना जीवन दहशत के साये में जीने को मजबूर है? इन सब सवालों के जबाव कौन देगा?
पुलिस और कानून व्यवस्था की बात अगर हम छोड़ दें तो बात करें इस तरह की घटनाओं को अन्जाम देने वाले लोगों की मानसिकता की, तो क्या यही हमारी आधुनिकता है। क्या हमारी आधुनिक सोच हमें हैवान बनना सिखा रही है? क्या आधुनिकता का ये माहौल हमारे देश के युवाओं को भटका रहा है? क्या आधुनिक होने का मतलब हैवान होना है तो इससे तो हम पिछड़े ही भले। आधुनिक होती आज की जीवन शैली में माता-पिता अपने बच्चों पर ध्यान देना भूल गए हैं। आज उन्होंने अपने बच्चों को पूरी फ्रीडम दे रखी है। इस फ्रीडम का लाभ उठा कर युवा निरंतर पथभ्रष्ट हो रहे हैं, इस ओर हमारा ध्यान नहीं जा रहा और जब ध्यान जाता है तब बहुत देर हो चुकी होती है। हमारी पुलिस व कानून व्यवस्था को महिलाओं की सुरक्षा के लिए सशक्त होना ही होगा। जितना जरूरी ये है उतना ही जरूरी है कि हम अपने बच्चों व रिश्तेदारों पर नजर रखें। उनकी कुंठित मानसिकता से उन्हें उबारने की कोशिश करें। उनके व्यवहार में आ रहे बदलावों की जांच करें और आवश्यकता पडऩे पर उनका उचित इलाज भी कराएं। क्योंकि इस तरह की घटनाओं को अन्जाम देने वाले लोग निश्चित रूप से मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं कहे जा सकते। अगर वे मानसिक रूप से स्वस्थ होते तो इस तरह की हैवानियत का परिचय न देते। 
बदलते समय के साथ आधुनिक होना बुरी बात नहीं है लेकिन आधुनिकता का लबादा ओढ़ते हुए हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कहीं कहीं हमारी आधुनिकता हमें पतन के मार्ग पर तो नहीं ले जा रही। आधुनिकता की आड़ में हैवानियत का चोला ओढऩा कतई तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता। इस तरह की घटनाओं के बारे में जानकर मन स्वत: ही ये प्रश्न करने लगता है कि आखिर किस तरफ जा रही है हमारी सोच, हमारी परवरिश। अगर ये सब आधुनिकता की देन है तो इससे तो हम पिछड़े ही भले। 
पुलिस व कानून व्यवस्था तथा अच्छी परवरिश के अलावा अगर किसी चीज पर नियंत्रण स्थापित करने की जरूरत है तो वह है टीवी व इंटरनेट। अभिभावकों को अपने बच्चों को इंटरनेट के गलत प्रयोग पर नियंत्रण स्थापित करना चाहिए। साथ ही साथ टेलीविजन पर प्रकाशित कार्यक्रमों के लिए भी निश्चित मानदंड तय होने चाहिए। ताकि पारिवारिक व घरेलू कहे जाने वाले कार्यक्रम पारिवारिक ही लगें, अश्लील नहीं। आज पारिवारिक कहे जाने वाले कार्यक्रमों में किस तरह से अश्लीलता परोसी जा रही है, इससे हम सब वाकिफ हैं ही। भले ही कार्यक्रम देखते समय हमें महसूस न हो पर इन सबका असर कहीं न कहीं हमारी मानसिकता पर जरूर पड़ता है और जिनकी परिणति होती है इस तरह की घटनाओं में। इसलिए इस तरह की घटनाओं पर लगाम कसने की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं बल्कि हम सबकी है, जिसे हम अपनी प्रभावशाली भागीदारी से निभा सकते हैं।