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Friday, June 6, 2014

अभी भी वक़्त है संभलने का

आजकल बेमौसम बरसात, अचानक आये आंधी-तूफान या भूकम्प से हम सभी आतंकित हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण हम सबका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। कब कौन सी प्राकृतिक आपदा हमारा सब कुछ तबाह करके चली जाएगी, हमें इसका अंदाजा तक नहीं है। हम सभी एक डर के साये में जीने को मजबूर हैं। इस डर के माहौल में हम प्रकृति को कोस रहे हैं, जो लगातार हमसे हमारे अपनों को छीन रही है लेकिन इन सबके बीच हम सबसे जरूरी बात भूल रहे हैं वो यह कि इसके जिम्मेदार भी हम खुद ही हैं। ये हमारा स्वार्थ ही था जिसके चलते हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया और आज प्रकृति हमारे साथ खिलवाड़ कर रही है। 
आज बेमौसम बरसात हो रही है और बारिश के दिनों में हमें बारिश के लिए तरसना पड़ता है। आज भी जब मैं कुछ साल पहले के अपने बचपन के दिन याद करती हूं तो मुझे याद आता है कि किस तरह हमारे स्कूल जाते-जाते ही झमाझम बारिश हो जाती थी और उस बारिश में भीगकर हम बहुत खुश होते थे। लेकिन अब बारिश के मौसम में हमें बारिश के लिए तरसना पड़ता है। आज हम प्रार्थना करते हैं कि यदि इंद्र देव की मेहरबानी हो तो हमें सूर्य देव के तीखे तेवरों और उनकी चढ़ती रश्मियों से थोड़ी देर राहत मिले। आज के हालत देखकर सोचती हूं कि कैसे कुछ ही समय में परिस्तिथियों में इतना फर्क आ गया ? पहले लोग अच्छे स्वास्थ्य के लिए सूर्य स्नान या सूर्य नमस्कार जैसी चीजों को महत्त्व देते थे लेकिन आज तो हमने सूर्य को भी इतना प्रदूषित कर दिया हैं कि अब उससे हमें फायदे की जगह नुकसान होने लगे हैं। 
ये सब परिणाम है हमारी स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं का, जिनकी पूर्ति के लिए हमने अंधाधुंध प्रकृति का शोषण किया। विकास के नाम पर लगातार नदियों, जंगलों, पहाड़ों और उद्यानों को नष्ट किया। इसके पीछे हमारे समाज के प्रबुद्ध वर्ग तर्क देते रहे कि विकास अपनी कीमत मांगता है लेकिन यह कैसा विकास है जो मानव के सर्वनाश का कारण बन रहा है। आज चारों ओर पृथ्वी पर ही रहे विनाश की चर्चा हो रही है। कहीं जंगलों में आग लग रही है तो कहीं भूकम्प ने मनुष्य जीवन को हिलाकर रख दिया है तो कहीं मनुष्य बाढ़ से ट्रस्ट है। इन हालातों को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यदि मनुष्य ऐसे ही निरंतर प्रकृति का दोहन करता रहा तो आने वाले समय में पूरी धरती नष्ट हो जाएगी। 
प्रकृति की इस दुर्दशा को देखते हुए इसके संरक्षण के लिए हमारे देश के कुछ लोगों ने वर्ष में एक बार पर्यावरण दिवस मनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का दायित्व उठाया है और यहां भी हालात बिलकुल ऐसे ही हैं जैसे हिंदी दिवस मनाने के हैं। साल में बस एक बार इनको बचाने का झुनझुना बजाकर हम खुद को सांत्वना दे रहे हैं। हम सिर्फ कुछ कार्यशालाओं और कार्यक्रमों का आयोजन कर अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि ये सिर्फ एक दिन की बात नहीं प्रकृति और उससे जुड़े मानव के सदा के संरक्षण का मसला है। ये प्रश्न है तो हमारे जलवायु और वायुमंडल में हो रहे परिवर्तनों का, जिसके लिए हम सभी दोषी हैं। सिर्फ एक दिन पर्यावरण दिवस मनाने से यह समस्या हल नहीं होने वाली, इसके लिए हम सभी के समग्र प्रयासों की आवश्यकता है। आवश्यकता है इस बात की कि हम सभी अपने-अपने स्तर पर इस प्रयास में अपनी भागीदारी निभाएं। अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है, यदि हम सभी सही मायनों में सफल प्रयास करना चाहें तो हम अब भी अपने विनाश को रोक सकते हैं।         

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