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Thursday, April 10, 2014

खुशी तेरे रंग निराले

खुशी तेरे भी कई अनोखे 
अजब रंग हैं निराले। 
पता नहीं कब कहां से 
तू आकर गले लगा ले। 
यूं तो खुशी, खुशी ही 
होती है, पर 
हर किसी के लिए इसके 
मायने अलग होते हैं। 
देखा मैंने एक बच्चे को 
कागज की नाव तैराकर 
खुश होते 
तो कहीं लोग महलों में 
भी नहीं खुश होते। 
किसी के लिए बारिश की  
पहली बूंद बन जाती 
है ख़ुशी का अफ़साना 
तो कोई भीगकर पूरे 
सावन में भी नहीं गा 
पाता खुशी का तराना। 
खुश है कोई सड़कों पर 
भी रात गुजारकर 
तो कहीं कोई खुश है 
इन्हीं लोगो की 
छोटी सी दुनिया उजाड़कर। 
खुश है कोई हाथों में 
मेहंदी रचाकर, तो वहीं 
खुश है कोई उसको 
बंधनों में बांधकर। 
खुश है कोई पहली बार 
रसोई बनाकर, तो 
खुश है कोई किसी के 
मुहं से निवाला छीनकर। 
खुश है मजदूर किसी के 
सपनों का घर बनाकर 
तो खुश है कोई उसी का 
आशियाना तोड़कर। 
खुश है कोई परायों को 
भी अपना बनाकर 
तो खुश है कोई अपनों को          
ही वृद्धाश्रम भेजकर। 
खुश है डॉक्टर किसी 
का जीवन बचाकर 
तो खुश है कोई किसी 
को गाडी से कुचलकर। 
खुश है किसान सबके लिए 
अन्न उगाकर 
तो खुश है कोई उसी की 
जमीन हथियाकर। 
खुश है कोई पहली बार 
नौकरी पाकर 
वहीं खुश है कोई लोगों को 
बेरोजगार बनाकर। 
खुश है कोई दूसरों का 
दर्द बांटकर 
तो खुश है कोई किसी की 
मुस्कान छीनकर। 
खुशी क्यों हैं तेरे इतने ढंग 
क्या सभी के लिए नहीं हो 
सकता खुशी का एक रंग ?

Wednesday, April 9, 2014

बारिश की बूंदें

कितनी अपनी कितनी सच्ची 
लगती हैं यह नन्हीं नन्हीं 
बारिश की बूंदें। 
कभी तन को तो कभी 
मन को भिगो जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 
कभी अपना होने का 
एहसास कराती हैं 
तो कभी एक पल में 
तन्हा छोड़ जाती हैं 
बारिश की बूँदें। 
कभी सपनों की रिमझिम 
फुहार बनकर आती हैं 
तो कभी उन्ही सपनो से 
मिला जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 
छल छल कल कल 
करती आपकी आपसे 
पहचान कराती  हैं 
बारिश की बूंदें। 
बारिश की बूंदों से 
रिश्ता पुराना था 
धीरे धीरे छूटा साथ 
इनसे मेरा 
पर अब भी मुझे 
अपना मानती हैं 
बारिश की बूंदें। 
मैं भले ही दूर रहूं इनसे 
पर अनजानी राहों पर 
आज भी मेरा साथ                                                        
निभाती हैं, ये पगली 
बारिश की बूंदें। 
तन्हा बैठी हूं, 
हूं खामोश आज 
ज़िन्दगी से शायद नाराज 
पर आज भी आकर 
बतियाती हैं मुझसे 
बारिश की बूंदें। 
ज़िन्दगी है जिंदादिली 
का दूसरा नाम 
आज भी मुझे यही 
एहसास कराती हैं 
बारिश की बूंदें। 
न जाने कब से 
ज़िन्दगी से दोबारा 
दोस्ती कराने में 
मेरा साथ निभा रही हैं 
बारिश की बूंदें। 
अपना पराया भूलकर
सबको ज़िन्दगी का 
नया पाठ पढ़ाती हैं 
बारिश की बूंदें।  
कागज़ की नाव को 
तैराकर पानी में 
कठिनाइयों से लड़ने 
का साहस दे जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 

Wednesday, April 2, 2014

उफ्फ यह सियासत।

उफ्फ यह सियासत। दिल कर रहा है कि जल्द ही चुनाव खत्म हों और नेताओं की बदजुबानी से छुटकारा मिले। चुनावी सरगर्मी के माहौल में सभी अपनी जुबान को खूब तकलीफ दे रहे हैं। लोकतंत्र के नाम पर चलने वाला यह मेला ख़त्म हो तो इन लोगों के अपशब्दों से लोगों का पीछा छूटे और टीवी चैनलों पर नेताओं की भिडंत रुके।