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Wednesday, April 9, 2014

बारिश की बूंदें

कितनी अपनी कितनी सच्ची 
लगती हैं यह नन्हीं नन्हीं 
बारिश की बूंदें। 
कभी तन को तो कभी 
मन को भिगो जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 
कभी अपना होने का 
एहसास कराती हैं 
तो कभी एक पल में 
तन्हा छोड़ जाती हैं 
बारिश की बूँदें। 
कभी सपनों की रिमझिम 
फुहार बनकर आती हैं 
तो कभी उन्ही सपनो से 
मिला जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 
छल छल कल कल 
करती आपकी आपसे 
पहचान कराती  हैं 
बारिश की बूंदें। 
बारिश की बूंदों से 
रिश्ता पुराना था 
धीरे धीरे छूटा साथ 
इनसे मेरा 
पर अब भी मुझे 
अपना मानती हैं 
बारिश की बूंदें। 
मैं भले ही दूर रहूं इनसे 
पर अनजानी राहों पर 
आज भी मेरा साथ                                                        
निभाती हैं, ये पगली 
बारिश की बूंदें। 
तन्हा बैठी हूं, 
हूं खामोश आज 
ज़िन्दगी से शायद नाराज 
पर आज भी आकर 
बतियाती हैं मुझसे 
बारिश की बूंदें। 
ज़िन्दगी है जिंदादिली 
का दूसरा नाम 
आज भी मुझे यही 
एहसास कराती हैं 
बारिश की बूंदें। 
न जाने कब से 
ज़िन्दगी से दोबारा 
दोस्ती कराने में 
मेरा साथ निभा रही हैं 
बारिश की बूंदें। 
अपना पराया भूलकर
सबको ज़िन्दगी का 
नया पाठ पढ़ाती हैं 
बारिश की बूंदें।  
कागज़ की नाव को 
तैराकर पानी में 
कठिनाइयों से लड़ने 
का साहस दे जाती हैं 
बारिश की बूंदें। 

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