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Friday, December 26, 2014

क्यों दिल का रोग लगाया हमने


अजब इस दिल की मुश्किल है
जिसको चाहा वही दिल से दूर है।
हमसफ़र के होते हुए भी ज़िन्दगी
की राहों में आज भी सिर्फ तन्हाई है।
तन्हाई की आदत यूं तो थी पहले भी
पर न जाने क्यों आज इस तन्हाई
ने दिल में कैसी पीर उठाई है।
शिकवा नहीं हमें किसी से भी
फिर भी अपने आप से गिला है
क्यों दिल को रोग लगाया हमने
जिसका हमें मिला ऐसा सिला है।
दोष न इसमें उनका न हमारा है
क्योंकि हमें यह हाल भी गवारा है।
दूर ही सही पर दिल को तसल्ली है
कि आखिर वो प्यारा प्यार हमारा है।

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