उन्मुक्त गगन में उड़ते पंछी
शायद यही हमने देखा है
लेकिन देखा आज एक पंछी
जो उड़ नहीं सकता था गगन में
पंख काट दिए थे शायद किसी ने
उस बेजुबान के
उड़कर ही अभिव्यक्त करता था
वह अपने भावों को
जीवन का हर सुख दुःख
दिखता था उसकी उड़ान में
उसकी उड़ान ही थी
पहचान उसकी
पर अब वो भी छिन गयी
फड़फड़ाता रहा बहुत देर तक
खुद ही लड़ता रहा अपने दर्द से
लेकिन लड़ते लड़ते खुद से
थक चुका था अब वह
बिना पंखों के नहीं बचा
उसके जीवन में उल्लास
जीने की चाह बहुत थी उसमें
पर नहीं जी सकता था
बिना पंखों के वह
तड़पता रहा, बस कहता रहा
लौटा दो मुझे पंख मेरे
पर अनसुनी थी उसकी यह
मूक पुकार
कोई नहीं दे पाया उसे
उसके जीवन की उड़ान
घिसट घिसट कर आया
गाडी के सामने
और कर दिया अपना
जीवन कुर्बान
सपने टूटने पर दर्द होता है
यह तो जानती थी मैं
पर बिना पंखों के जीवन जीना
कितना मुश्किल है
कैसे छोड़ने पड़ते हैं
अपने अरमान
अपने आप अपने अरमानों
की क़ुरबानी देना
नहीं है यह आसान
बहुत दर्द सहकर ही
उस पंछी ने यह कदम
उठाया होगा
यह आज जाना है।
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