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Thursday, March 6, 2014

यह कैसा लोकतंत्र है ?


हमारे देश को बड़े लोकतांत्रिक देश के उदहारण के रूप में देखा व जाना जाता रहा है लेकिन सच्चाई तो यह है कि जिस लोकतंत्र का सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और हमारे पूर्वजों ने देखा था वो तो कहीं बचा ही नहीं है।  हमारे इस इस लोकतंत्र में कुछ बचा है तो वो है भ्रष्टाचार, चापलूसी, लालफीताशाही, राजनेताओं की मनमानी और इसकी सबसे बड़ी मिशाल बनकर उभरा है देश की लोकतंत्रात्मक सरकार में अहम् भूमिका निभाने वाला राज्य उत्तरप्रदेश। जहाँ अभी कुछ समय पहले ही व्यापक स्तर पर दो गुटों के बीच दंगे हुए थे और मामले के बुरी तरह तूल पकडने के बाद प्रशासन की तन्द्रा टूटी थी। गुंडागर्दी और अव्यवस्था तो जैसे उत्तरप्रदेश सरकार का पर्याय बन चुकी है।  युवा जोश अखिलेश यादव की सरकार बनने के बाद जनता में थोड़ी आस जगी थी कि शायद यवा हाथों में शासन की बागडोर आने के बाद राज्य का कुछ कल्याण होगा मगर अफ़सोस नतीजे सिफर ही रहे। उल्टा शासन व प्रशासन व्यवस्था और चरमरा गयी है।  इसका जीता जागता उदहारण है उत्तरप्रदेश के महत्त्वपूर्ण प्रदेश कानपूर में चल रही डॉक्टर्स की हड़ताल।  एक नेता की मनमानी से डॉक्टर्स की नाराजगी इस हद तक बढ़ गयी है कि इस आग की लपटें सिर्फ उत्तरप्रदेश को ही नहीं जला रही अपितु देश के अन्य राज्यों में भी इसकी आंच तेजी से फैलने लगी है। देश की राजधानी दिल्ली भी तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रही है। खैर, इस हड़ताल के लिए दोषी कोई भी पर अंततः इसका खामियाजा हमेशा की तरह आम आदमी ही भुगत रहा है। इलाज के अभाव में कई मरीज पहले ही दम तोड़ चुके हैं और अगर उत्तरप्रदेश प्रशासन अभी भी नहीं जागा तो और न जाने कितनी ज़िंदगियों को प्रशासन की मनमानी के आगे अपनी भेंट चढ़ानी पड़ेगी। 
देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर आम आदमी और राजनेताओं दोनों का ही समान रूप से अधिकार है। ऐसे में स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए सिफारिशों का सहारा लेना कहाँ तक उचित है। माना जाता है कि झगड़ा उस समय शुरू हुआ, जब एक मरीज के सेवक ने समाजवादी पार्टी (एसपी) विधायक इरफान सोलंकी से संपर्क कर उन्हें डॉक्टर्स से इलाज करने के लिए बोलने को कहा। डॉक्टर्स ने जब सिफारिश को तव्वजो नहीं दी तो विधायक ने बात करने के लिए अपने सहायक को भेजा, लेकिन डॉक्टर्स ने उसे भी अनसुना कर दिया। इसके बाद विधायक की अनदेखी करने की सजा आख़िरकार आम जनता भुगत रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्यों प्रशासन की तरफ से डॉक्टर्स को मानाने की पुरजोर कोशिश क्यों नहीं की जा रही है। इस मामले की जाँच में क्यों कोताही बरती जा रही है? सरकार जल्द से जल्द निष्पक्ष जाँच करवाकर पूरे मामले को अन्य डॉक्टर्स तथा आम जनता के सामने आईने की तरह साफ़ क्यों नहीं कर देती है?   
डॉक्टर्स के हॉस्टल में पुलिस द्वारा हथियार रखवाकर डॉक्टर को फंसाने की कोशिश करने की जो बात मीडिया में आ रही है क्या वह प्रशासन द्वारा अपने विधायक को निर्दोष और सम्बंधित डॉक्टर को दोषी साबित करने की कवायद नहीं है। अगर डॉक्टर इस घटना के लिए जिम्मेदार थे और वह मरीज का इलाज करने में कोताही बरत रहे थे तो इस बात को उसी रूप में सामने क्यों नहीं लाया गया। डॉक्टर्स के हॉस्टल से अवैध हथियार बरामद होने की बात साफ तौर पर विधायक को बचाने को कोशिश के रूप में ही देखी जा रही है। एक डॉक्टर और विधायक के बीच की बहस का इस स्तर तक पहुंचने को देश में लोकतान्त्रिक शासन की जगह तानाशाही शासन व्यवस्था के आगमन के रूप में देखा जा सकता है।  हालाँकि इसके पहले भी दिल्ली में हुए कई धरना प्रदर्शन इसके आगमन की दस्तक दे चुके हैं। ऐसे में इतने व्यापक पैमाने पर हो रही इस हड़ताल को क्या केंद्र व राज्य सरकार की नाकामी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए? कहने को तो आज हमारा देश विकासशील है। अपनी उन्नति और सफलता के नए अध्याय लिख रहा है लेकिन यह कैसी उन्नति है जहाँ आम जनता को स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में अपनी जान गंवानी पड़ रही है। डॉक्टर्स और विधायक के बीच हुई बहस ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया और इस समस्या से निजात पाने का उपाय किसी के पास नहीं है। हमारे संविधान में सबके लिए समान अधिकारों की व्यवस्था तो की गयी है लेकिन व्यवहार में संवैधानिक सिद्धांतों का कोई अर्थ नहीं रह गया है। यहाँ केवल राजनैतिक शक्ति का जोर चलता है इसके आगे सभी कायदे-कानून और संवैधानिक विधान का कोई वश नहीं चलता।जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत इन हालातों में पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। 
डॉक्टर्स की इस हड़ताल ने एक बार फिर हमारे देश की शासन व्यवस्था पर कई सवाल उठा दिए हैं। अब देखना यह है कि सरकार जनता के मन में उठ रहे कई सवालों का जबाव देने में कितनी सफल हो पाती है? डॉक्टर और विधायक जो भी दोषी था उसकी निष्पक्ष जाँच करवाकर कितना इन्साफ कर पाती है? आखिर प्रशासन राज्य व देश में फिर से कब व कैसे स्वास्थ्य सेवाओं को बहाल करने में सफल हो पाती है। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण पैदा हुए हालातों का खामियाज़ा आम जनता को भुगतना पद रहा है। चिकित्सकीय सेवाओं के अभाव में कई निर्दोष काल कवलित होते जा रहे हैं। ऐसे में सरकार व प्रशासन का नैतिक दायित्व भी यही बनता है जल्द से जल्द इस मामले का समाधान किया जाए। डॉक्टर्स की हड़ताल को ख़त्म करवाकर जनता को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करवाना सरकार का नैतिक दायित्व है। मामले की गम्भीरता को देखते हुए आवश्यक हो गया है कि सभी दल अपनी सियासी रोटियां सेकने की बजाय एकजुट होकर इस समस्या का कारगर समाधान खोजें। नहीं तो हालात दिन ब दिन बिगड़ते जाएंगे और यह बिगड़े हुए हालात कहीं से भी हमारे देश के लोकतांत्रिक होने का प्रमाण नहीं देंगे। बिगड़ते हुए हालात हमारे देश में फ़ैल रही अराजकता के साक्ष्य मात्र बनकर रह जाएंगे। लगातार बिगड़ते हालात उदघोषणा है देश की चरमराती राजनैतिक व्यवस्था की। आने वाले कुछ दिनों में देश में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं।  लोकसभा को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है।  लेकिन यह हालात हमारे इस मंदिर के खंडित होने की सूचना दे रहे हैं। इस मंदिर को बचाये रखने के लिए शासन-प्रशासन को एकजुट होकर प्रयास करने ही होंगे। तभी आगामी लोकसभा चुनावों का महत्त्व कायम रह पायेगा। अन्यथा लोकतंत्र चुनाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल्य नष्ट हो जाएंगे।  

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