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Friday, March 7, 2014

उड़ना चाहती हूँ पंख पसार

महिला दिवस की पूर्व संध्या पर 
बेचैन है मन कि क्या इस बार 
मुझे मेरी पहचान मिल पायेगी  
या हर बार की तरह महिला दिवस की 
यह शाम भी यूँ ही गुजर जायेगी। 

हर साल की तरह इस साल भी मनेगा 
महिलाओं का यह जश्न, बनेंगी योजनाएं 
होगी महिलाओं के अधिकारों की बातें 
पर क्या होगा उनका, क्या होगा उनका   
कुछ भी नहीं, यूँ ही गुजर जायेगा वक़्त।

कहने को आज़ाद हैं महिलाएं, है उनके 
पास भी स्वच्छंद उड़ने को उन्मुक्त गगन 
फिर क्यों छीन लेता है समाज उनके पंख 
क्या जी रही हैं सभी महिलाएं अपनी मर्जी से 
पूछ रहा है मुझसे मेरा बेकल पागल मन। 

सपने संजो रहे हैं मेरे भी नयन, पूछ रही 
है मुझसे, मेरे दिल की हर धड़कन, क्या 
होगा मेरी इन नादाँ ख्वाहिशों का अंजाम 
क्या कुचले जायेंगे मेरे यह सपने, या मिलेंगे 
इन्हे उड़ने को 'पर', क्या मिलेगा इन्हें आसमान। 

मुझे मेरा आकाश दे दो, कह रही है 
यह देश की हर महिला, हर बेटी 
यह आज़ादी मिलते ही, नहीं होगी जरूरत 
किसी महिला दिवस को मनाने की 
जैसे नहीं है जरूरत हमें पुरुष दिवस 
को मनाने की, क्योंकि हर दिन है उनका 
हर अधिकार हैं उन्हें मिला, ऐसे ही   
हर दिन होगा महिलाओं का, हर आज़ादी 
होगी उनके लिए भी, मिल जायेगा उन्हें 
उनके ख्वाबों को पूरा करने के लिए आकाश। 
क्या आएगा ऐसा कोई दिन, उनके हिस्से में 
जब पूरी होगी मेरी यह वर्षों पुराणी आस।    

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